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सम्मान : लघुकथा

"कुछ सिखाओं अपनी माँ को | शहर में रहते पच्चीसों साल हो गये पर रही गंवार की गंवार |"
" बड़े साहब कितनी बार कहें बैठ जाओ पर ये बैठी नहीं |"
"कइसे बैठती जी, वो 'पैताने' बैठने को कहत रहा | "...सविता मिश्रा

"मौलिक व अप्रकाशित"

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Comment by savitamishra on May 26, 2015 at 11:44pm

मदन भैया  ऐसा क्या हमने लिखा  जो समझ स पर हो गया आपके

Comment by Madan Mohan saxena on May 20, 2015 at 2:53pm

samajh se pare

Comment by savitamishra on April 18, 2015 at 10:29am

आप सभी आगंतुकों का तहेदिल से आभार व्यक्त करतें हैं ..आपकी प्रतिक्रियाओ से सीख मिलती हैं ...जो लिखते वक्त लगता हैं सही लिखा हैं उसकी प्रतिक्रिया के बाद पता चलता हैं कि कहीं तोकुछ कमी  हैं ...इसमें भी कमियाँ निकली पर कुछ  ने  सही  ठहराया  ..दोनों तरह के अनुभवी लोगों का सादर आभार  ...यूँ ही मार्गदर्शन करतें रहियें ....आप केबोलने से ही हम सीखते हैं सादर 

Comment by savitamishra on April 17, 2015 at 2:38pm

आदरणीय सौरभ भैया दिल से आभार ...सादर नमस्ते
कलम चलते चलते कभी कभी अनजाने में अच्छी चल जाती हैं | सही कहते लोग मुर्ख भी और बच्चा भी ज्ञान की भाषा कभी न कभी बोल जाता हैं....आज शायद  हमरी  कलम भी  चल  गयी   | ..कुछ ऐसा ही महसूस हो रहा हैं आज


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on April 16, 2015 at 11:38pm

आपकी कथा को तो पढ़ा ही, इस कथा पर आयी प्रतिक्रियाओं को भी पढ़ा, आदरणीया सविताजी. आपकी कथा का मर्म बहुत ही महीन है. पैताने वाली बात मुझे गहरे छू गयी. कथा के साहेब को शायद पता न होगा और अनजाने में उनके द्वारा दिया गया सम्मान भी वृद्धा माता को नागवार गुजरा. अवश्य गुजरा होगा.

आपकी इस लघुकथा की अंतरधारा का हम सम्मान करते हैं आदरणीया..

सादर

Comment by savitamishra on April 16, 2015 at 10:59pm

जिंतेंद्र भाई बहुत बहुत शुक्रिया दिल से

Comment by savitamishra on April 16, 2015 at 10:59pm

अमन भाई और श्याम भाई दिल से आभार आपका व्यक्त करतें हैं ..सहीं कहा आपने लाभ और लोभ दोनों भारी पड़ते है संस्कार गौड़

Comment by savitamishra on April 16, 2015 at 10:56pm

 गोडवारी भी कहते हैं हरी भैया ....
परबत के पैताने पहुँचे परबत के सिरहाने भी
कहाँ-कहाँ तक ले जाते हैं अक्सर कई बहाने भी......ये 
रामकुमार कृषक जी की कविता है
जब ये गाना सुने ही हैं फिर कैसी समस्या ....हमने तो नहीं सुना ..बस लिखते समय पैताने ही शब्द दिमाग में आया .....mudsire, godsire भी आ रहा हैं दिमाग में शायद कहते हैं
इस बार जा रहें हैं इलाहाबाद ध्यान से सुनेगे आंचलिक शब्द

Comment by savitamishra on April 16, 2015 at 10:50pm

माननीय राजकुमार भैया आभार ..सही कहा पहले घुट्टी में ही मिलते थे ..अब सब चलता हैं जैसे संस्कार घुटाये जातें हैं

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on April 16, 2015 at 7:46pm

बहुत सुंदर लघुकथा, आदरणीया सविता जी. बधाई आपको

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