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आगे पीछे : लघुकथा


"कहाँ आगे-आगे बढ़े जा रहे हो जी', मैं पीछे रह जा रही हूँ |"
"तुम हमेशा ही तो पीछे थी"
"मैं आगे ही रही "
"और चाहूँ तो हमेशा आगे ही रहूँ, पर तुम्हारें अहम् को ठेस नहीं पहुँचाना चाहती हूँ समझे|"
"शादी वक्त जयमाल में पीछे ..."
"डाला जयमाल तो मैंने आगे"
"फेरे में तो पीछे रही"
"तीन में पीछे, चार में तो आगे रही न "
"गृह प्रवेश में तो पीछे"
"जनाब भूल रहे हैं, वहां भी मैं आगे थी "
इसी आगे पीछे को लेकर लड़ते -हँसते  पार्क से बाहर निकले और एक दूजे से नोंकझोक करते हुए ही बेफिक्र हो बाइक से  जा रहे थे| सुनसान रास्ते पर बदमाशों ने उनकी बाइक रोक तमंचा तान दिया - "निकालो सारे गहने" चीखा एक |
दुवेश शीला को पीछे कर,बदमाशों से भिड़ गया |
जैसे ही घोड़ा दबा, पत्नी उसकी बाहों में झूलती हुई मुस्करा कर बोली " लो जी यहाँ भी मैं आगे ..|"

सविता मिश्रा

"मौलिक व अप्रकाशित"

Views: 978

Comment

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Comment by savitamishra on February 12, 2015 at 12:28pm

आभार आपका चाचाजी .सादर नमस्ते ..अपना आशीष यु ही बनाये रखे

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on February 11, 2015 at 1:38pm

आदरणीया सविता जी

अप्रत्याशित अंत i इसके लिए जो वातावरण आपने पहले तैयार किया उसके लिए बधाई i

Comment by savitamishra on February 8, 2015 at 10:17pm

गुमनाम भाई शुक्रिया आपका

Comment by savitamishra on February 8, 2015 at 10:17pm

शुक्रिया बागी भाई रास्ता दिखाने का और सौरभ भैया आपका भी यू ही मार्गदर्शन करते रहिये ....दरकार भी है हमे

Comment by gumnaam pithoragarhi on February 8, 2015 at 7:11pm

वाह बहुत खूब काफी सुन्दर............


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on February 8, 2015 at 10:25am

///अब ठीक है ................////

अब बिल्कुल ठीक है जी, जो मैं कहना चाहता था आप तक बात पहुंची और उसी अनुसार आपने लघुकथा में आपेक्षित सुधार भी किया, सादर.

Comment by savitamishra on February 7, 2015 at 11:43pm
Comment by savitamishra just now
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आदरणीय सौरभ भैया आभार आपका तहेदिल से ..संसोधन कर तो दिए भैया पर शायद आप ध्यान ना दिए  ..सादर नमस्ते


"जनाब भूल रहे हैं, वहां भी मैं आगे थी "
इसी आगे पीछे को लेकर लड़ते -हँसते  पार्क से बाहर निकले और एक दूजे से नोंकझोक करते हुए ही बेफिक्र हो बाइक से  जा रहे थे| सुनसान रास्ते पर बदमाशों ने उनकी बाइक रोक तमंचा तान दिया - "निकालो सारे गहने" चीखा एक |

क्या सही है अब एडिट कर ले इसे


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on February 7, 2015 at 10:54pm

हल्के-फुल्के नोंक-झोंक वाले प्लाट पर आधारित इस लघुकथा का अंत अचानक ऐसा गहन है कि मन एकबारग़ी झन्ना जाता है. हँसते-मुस्कुराते पत्नी का मौत को एक तरह से गले लगाने को उद्यत हो जाना तनिक अटपटा सा लगा. पत्नी के प्रेम की तीव्रता को क्या पति समझ नहीं पाया था कि पत्नी को उस समय यह कह कर अहसास कराना पड़ा जब मौत आसन्न थी ? भले मौत आयी न हो ?
वैसे आपके प्रयास पर आपको बधाई, कि कथा बाँधती है. गनेश भाई के कहे पर मेरी भी सम्मति है.  
शुभेच्छाएँ

Comment by savitamishra on February 7, 2015 at 10:45pm

अब ठीक है ...

"कहाँ आगे-आगे बढ़े जा रहे हो जी', मैं पीछे रह जा रही हूँ |"
"तुम हमेशा ही तो पीछे थी"
"मैं आगे ही रही "
"और चाहूँ तो हमेशा आगे ही रहूँ, पर तुम्हारें अहम् को ठेस नहीं पहुँचाना चाहती हूँ समझे|"
"शादी वक्त जयमाल में पीछे ..."
"डाला जयमाल तो मैंने आगे"
"फेरे में तो पीछे रही"
"तीन में पीछे, चार में तो आगे रही न "
"गृह प्रवेश में तो पीछे"
"जनाब भूल रहे हैं, वहां भी मैं आगे थी "
इसी आगे पीछे को लेकर लड़ते -हँसते  पार्क से बाहर निकले और एक दूजे से नोंकझोक करते हुए ही बेफिक्री बाइक से  जा रहे थे| सुनसान रास्ते पर बदमाशों ने उनकी बाइक रोक तमंचा तान दिया - "निकालो सारे गहने" चीखा एक |
दुवेश शीला को पीछे कर,बदमाशों से भिड़ गया |
जैसे ही घोड़ा दबा, पत्नी उसकी बाहों में झूलती हुई मुस्करा कर बोली " लो जी यहाँ भी मैं आगे ..|"

Comment by savitamishra on February 7, 2015 at 10:40pm

बागी भाई दिल से शुक्रिया आपका ..प्रभाकर भैया ने कहा था जैसा हम समझ पाए थे कि लघुकथा में जरुरी नहीं है बताना नाम या स्थान बिना जरूरत ..अतः नहीं लिखे यदि तकनीकि खामी है और आपके बोलने के बाद हमे भी यही लग रहा की कुछ तो मेंशन होना था ...शुक्रिया आपका आपने  राय दी ...कोशिश करते है फिर
मार्गदर्शन का एक बार फिर से शुक्रिया

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