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मुक्तिका: ...चलो प्रिय. ---संजीव 'सलिल'

मुक्तिका
...चलो प्रिय.
संजीव 'सलिल'
*
लिये हाथ में हाथ चलो प्रिय.
कदम-कदम रख साथ चलो प्रिय.

मैं-तुम गुम हो, हम रह जाएँ.
बन अनाथ के नाथ चलो प्रिय.

तुम हो मेरे सिर-आँखों पर.
मुझे बनाकर माथ चलो प्रिय.

पनघट, चौपालें, अमराई
सूने- कंडे पाठ चलो प्रिय.

शत्रु साँप तो हम शंकर हों
नाच, नाग को नाथ चलो प्रिय.

'सलिल' न भाती नेह-नर्मदा.
फैशन करने 'बाथ' चलो प्रिय.

***********************

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Comment

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Comment by sanjiv verma 'salil' on June 14, 2010 at 8:59am
बढ़ा रहे उत्साह जो, उन सबका आभार.
मौन सराहें जो-न क्यों, जोड़े मन के तार..
Comment by baban pandey on June 10, 2010 at 1:35pm
WAAH SALIL BHAI...MAZA AA GAYE.....AISE RACHNAYE BAHUT HI KAM MILTI HAI ...BADHAI SWEEKAR KARE
Comment by satish mapatpuri on June 10, 2010 at 11:09am
लिये हाथ में हाथ चलो प्रिय.
कदम-कदम रख साथ चलो प्रिय.
शत्रु साँप तो हम शंकर हों
नाच, नाग को नाथ चलो प्रिय.
शत्रु साँप तो हम शंकर हों
नाच, नाग को नाथ चलो प्रिय.
शत्रु साँप तो हम शंकर हों
नाच, नाग को नाथ चलो प्रिय.

शत्रु साँप तो हम शंकर हों
नाच, नाग को नाथ चलो प्रिय.
श्रद्धेय सलिल जी, बहुत सुन्दर मुक्तक है. मेरा साधुवाद स्वीकार करें.

प्रधान संपादक
Comment by योगराज प्रभाकर on June 9, 2010 at 2:24pm
Acharya jee, bahut hi sunder Muktika hai.
Comment by Admin on June 9, 2010 at 1:42pm
शत्रु साँप तो हम शंकर हों
नाच, नाग को नाथ चलो प्रिय.

'सलिल' न भाती नेह-नर्मदा.
फैशन करने 'बाथ' चलो प्रिय.
बहुत ही बढ़िया आचार्य जी , आप का लिखा एक एक लाइन पढ़ने के बाद मन मुग्ध हो जाता है, बार बार पढ़ने की इछा ये बताने मे सक्षम है की रचना की खूबसूरती कितनी है, सादर आभार ,
Comment by Rash Bihari Ravi on June 9, 2010 at 1:29pm
शत्रु साँप तो हम शंकर हों
नाच, नाग को नाथ चलो प्रिय.
sir ji bahut sundar rachna sabd nahi hain mere pas ,
Comment by aleem azmi on June 9, 2010 at 12:55pm
very nice sir....its really touching one....thnx
best rgrds
aleem azmi

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