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ग़ज़ल :- कहीं थे बाज़ू कहीं बदन था

बह्र :- फ़ऊल फ़ैलुन फ़ऊल फ़ैलुन

कहीं थे बाज़ू कहीं बदन था
हिजाब आलूद पैरहन था

निगाह ख़ंजर बनी हुई थी
नज़र हटाई तो गुलबदन था

कहाँ तलक उससे बच के चलते
वो डाली डाली चमन चमन था

समझ के गुलशन की बात की थी
मुराद मेरी तिरा बदन था

सालीक़ा लाओगे वो कहाँ से
सुना है फ़रहाद कोहकन था

हर एक मंज़िल पे देखा जाकर
वही सितारा वही गगन था

भला सा लगता था उन दिनों में
तिरी अदा में जो बांकपन था

अभी "समर" की बिसात क्या है
कभी तुम्हारा वो जान-ए-मन था


"समर कबीर"
मौलिक/अप्रकाशित

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Comment

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Comment by Samar kabeer on May 1, 2015 at 10:46am
जनाब वीनस केसरी जी,आदाब,ग़ज़ल में शिर्कत और हौसला अफ़ज़ाई के लिये तहे दिल से शुक्रगुज़ार हूँ |
Comment by Samar kabeer on May 1, 2015 at 10:42am
जनाब डा.आशुतोष मिश्रा जी,आदाब,सकारात्मक प्रतिक्रिया और उत्साह वर्धन के लिये बहुत बहुत शुक्रिया |

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on May 1, 2015 at 10:03am

क्या बात है , आदरणीय समर कबीर भाई , लाजवाब गज़ल कही है , शे र दर शे र मुबारक बाद कुबूल करें ॥

Comment by वीनस केसरी on May 1, 2015 at 12:26am

वाह जनाब क्या कहने उम्दा ग़ज़ल हुई है

Comment by Dr Ashutosh Mishra on April 30, 2015 at 10:38pm

कहाँ तलक उससे बच के चलते
वो डाली डाली चमन चमन था....बहुत बढ़िया
हर एक मंज़िल पे देखा जाकर
वही सितारा वही गगन था..शानदार
अभी "समर" की बिसात क्या है
कभी तुम्हारा वो जान-ए-मन था,,मतलब निकल गया है तो पहचानते नहीं हैं बहुत बढ़िया आदरणीय समर कबीर जी मेरी हार्दिक शुभकामनायें स्वीकार करें सादर

Comment by Samar kabeer on April 30, 2015 at 6:28pm
आली जनाब डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव जी,आदाब, ग़ज़ल में शिर्कत और हौसला अफ़ज़ाई के लिये तहे दिल से शुक्रगुज़ार हूँ |
Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on April 30, 2015 at 12:58pm

आ० समीर कबीर साहेब

क्या बेहतरीन गजल कही है i बहुत उम्दा -भला सा लगता था उन दिनों में
तिरी अदा में जो बांकपन था

अभी "समर" की बिसात क्या है
कभी तुम्हारा वो जान-ए-मन था

Comment by Samar kabeer on April 30, 2015 at 10:45am
जनाब मोहन सेठी 'इंतज़ार' जी, आदाब,सुख़न नवाज़ी के लिये आपका तहे दिल से शुक्रगुज़ार हूँ |
Comment by Samar kabeer on April 30, 2015 at 10:43am
आली जनाब डा.विजय शंकर जी,आदाब,आपकी शिर्कत ग़ज़ल में हो गई लिखना सार्थक हुवा,हौसला अफ़ज़ाई के लिये दिल से शुक्रगुज़ार हूँ |
Comment by Samar kabeer on April 30, 2015 at 10:40am
जनाब नरेन्द्र सिंह चौहान जी,आदाब,हौसला अफ़ज़ाई के लिये तहे दिल से शुक्रिया |

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