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ग़ज़ल :-एक चहरे में दूसरा क्या है

बह्र :- फ़ाईलातुन मुफ़ाइलुन फ़ैलुन

आईनागर ज़रा बता क्या है
एक चहरे में दूसरा क्या है

आग गुलज़ार कैसे बनती है
देखना है तो सोचता क्या है

किस लिये हम से पूछता है नदीम
तू नहीं जानता,हुवा क्या है

क्या छुपा कर रखा है सीने में
और होटों से बोलता क्या है

दिल को छू जाए तो ये जादू है
वरना आवाज़ में धरा क्या है

आईने की तरह चमकती है
हम बताऐं तुम्हें वफ़ा क्या है

दोनों बर्बाद हो गए देखो
दुश्मनी के लिये बचा क्या है

मैं हूँ दीवाना और तू हुश्यार
मुझ से तेरा मुक़ाबला क्या है

ख़ुद को "ग़ालिब" समझ रहा है "समर"
"या इलाही ये माजरा क्या है"

"समर कबीर"
(मौलिक/अप्रकाशित)

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Comment by Samar kabeer on April 23, 2015 at 10:38am
जनाब सौरभ पाँडे जी,आदाब,आपकी शिर्कत ग़ज़ल में हो गई लिखना सार्थक हुवा,हौसला अफ़ज़ाई के लिये दिल से शुक्रगुज़ार हूँ|

सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on April 23, 2015 at 12:00am

इस गज़लके लिए दिल से दाद कुबूल फ़रमायें मो समर कबीर साहब

 

Comment by Samar kabeer on April 22, 2015 at 2:56pm
जनाब डा.आशुतोष मिश्रा जी,आदाब,हौसला अफ़ज़ाई के लिए तहे दिल से शुक्रगुज़ार हूँ |
Comment by Samar kabeer on April 22, 2015 at 2:53pm
जनाब धर्मेन्द्र कुमार सिंह जी,आदाब,सुख़न नवाज़ी के लिये आपका तहे दिल से शुक्रगुज़ार हूँ |
Comment by Samar kabeer on April 22, 2015 at 2:51pm
जनाब जितेन्द्र पस्टारिया जी,आदाब,ज़र्रा नवाज़ी के लिये तहे दिल से शुक्रगुज़ार हूँ |
Comment by Samar kabeer on April 22, 2015 at 2:49pm
जनाब मिथिलेश वामनकर जी,आदाब, ग़ज़ल में आपकी शिर्कत और हौसला अफ़ज़ाई के लिये तहे दिल से शुक्रगुज़ार हूँ |
Comment by Dr Ashutosh Mishra on April 22, 2015 at 1:41pm

आदरणीय समर कबीर जी ..इस शानदार ग़ज़ल के लिए तहे दिल बधाई सादर 

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on April 22, 2015 at 10:32am

बड़ी ख़ूबसूरत ग़ज़ल हुई है जनाब समर साहब।

दोनों बर्बाद हो गए देखो
दुश्मनी के लिये बचा क्या है

ये शे’र बड़ा ही ख़ूबसूरत और बार बार कोट करने लायक है। बारंबार दाद कुबूल कीजिए।

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on April 22, 2015 at 10:11am

खूबसूरत गजल ,आदरणीय समर साहब. हर शेर तारीफ़ के काबिल हुआ, दिली बधाई कुबूल करें


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on April 21, 2015 at 10:47pm
आदरणीय समर कबीर जी बेहतरीन ग़ज़ल हुई है दिल से दाद कुबूल फरमाएं।

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