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" अरे रामू , तुम वापस कब आये , फिर से घर का काम करोगे "?
" क्या करता साहब , बेटा तो अपनी नौकरी पर चला जाता था और रात देर से लौटता था "।
" तो क्या , आराम से घर पर रहते , बहू और बच्चों के साथ समय बिताते "।
" अब क्या कहूँ साहब , आप कम से कम हमें नौकरों जैसा तो समझते हो , पर बहू तो .."!

मौलिक एवम अप्रकाशित

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Comment by विनय कुमार on May 21, 2015 at 8:44pm

बहुत बहुत आभार आदरणीय सौरभ पाण्डेय जी , आपके शेर के लिए धन्यवाद..


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on May 21, 2015 at 7:00pm

मैं आपकी इस लघुकथा को अपना एक शेर दे रहा हूँ -

घोर आपत्तियों के मौसम में

मौन तक आज मुखर लगता है

बहुत खूब आदरणीय !

Comment by विनय कुमार on May 15, 2015 at 12:07pm

बहुत बहुत आभार आदरणीय सुभ्रांशु पाण्डेयजी.

Comment by Shubhranshu Pandey on May 15, 2015 at 10:19am

आदरणीय विनय जी,

मौन को इस हद तक मुखर बनाने के लिये बधाई..

सादर.

Comment by विनय कुमार on May 15, 2015 at 1:19am

बिलकुल सही कहा आपने आदरणीय जितेन्द्र पस्टारिया जी , पोस्ट करने की जल्दी ही अक्सर कारण होती है इसकी | पुनः आभार.

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on May 15, 2015 at 12:29am

विलम्ब हेतु क्षमा ,आदरणीय विनय जी. आपके संशोधन पश्चात लघुकथा में बहुत निखार आ गया है ,अक्सर हम शायद पोस्ट करने की आतुरता में भूल जाते है. मेरे साथ तो यही कारण है :-))

प्रस्तुति पर आपको पुन: बधाई आदरणीय विनय जी   सादर!

Comment by विनय कुमार on May 14, 2015 at 11:26pm

धन्यवाद , सादर नमस्ते आदरणीय सविता मिश्रा जी..

Comment by savitamishra on May 14, 2015 at 10:44pm

बढ़िया कहीं आपने ..सादर नमस्ते

Comment by विनय कुमार on May 14, 2015 at 10:40pm

बहुत बहुत आभार आदरणीय कृष्ण मिश्रा जान गोरखपुरी जी .

Comment by Krish mishra 'jaan' gorakhpuri on May 14, 2015 at 3:47pm

वाह! सुन्दर लघुकथा पर बधाई आ० विनय जी!

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