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" अंकल " , बस यही आवाज़ निकल पायी थी उसके मुँह से |
पहले भी यही आवाज़ निकलती थी , पर वो आवाज़ ख़ुशी की होती थी |
आज वो अपनी सहेली के घर बिना फोन किये आई , और अब अस्पताल में बेसुध पड़ी थी |
मौलिक एवम अप्रकाशित

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Comment by विनय कुमार on May 15, 2015 at 1:16am

बहुत बहुत आभार आदरणीय सौरभ पाण्डेय जी , आपकी उपस्थिति मनोबल बढ़ाती है | 


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on May 14, 2015 at 11:52pm

ओह ! हृदयविदारक ! आपकी इस प्रस्तुति ने झकझॊर दिया भइया.. 

शुभ-शुभ

Comment by विनय कुमार on May 13, 2015 at 2:41am

बहुत बहुत आभार आदरणीया ज्योत्स्ना कपिल जी । 

Comment by विनय कुमार on May 13, 2015 at 2:40am

बहुत बहुत आभार आदरणीय रवि प्रभाकर जी । एक उत्कृष्ट लघुकथाकार द्वारा दी गयी ये टिप्पणी बहुत मनोबल बढाती है..

Comment by jyotsna Kapil on May 12, 2015 at 10:40pm
सुंदर ,सार्थक एवम् दिल को झकझोरने वाली कथा के लिए बधाई आ विनय कुमार जी।
Comment by Ravi Prabhakar on May 12, 2015 at 10:26pm

तथाकथित रिश्‍तों के स्‍याह पक्ष को उजागर करती सशक्‍त लघुकथा । यह आपकी श्रेष्‍ठ लघुकथाओं में से एक है। सफल प्रस्‍तुति हेतु आपको बहुत बहुत बधाई आदरणीय विनय भाई जी ।

Comment by विनय कुमार on May 12, 2015 at 12:53am

बहुत बहुत आभार आदरणीय श्री वीर मेहता जी..

Comment by VIRENDER VEER MEHTA on May 11, 2015 at 5:25pm

पतन की पराकाष्टा को सफलता के साथ दिखाती सुन्दर लेकिन मन को झकझोर देने वाली रचना., आदरणीय विनय कुमार जी ....

सादर बधाई स्वीकार करे !

Comment by विनय कुमार on May 11, 2015 at 12:03pm

बहुत बहुत आभार आदरणीय श्री मिथिलेश वामनकर जी ..

Comment by विनय कुमार on May 11, 2015 at 12:02pm

बहुत बहुत आभार आदरणीय श्री सुनील जी..

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