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आज नयी बहू ने नौकर को बड़ी बहू के कमरे से रात में निकलते देख लिया । रात आँखों आँखों में बीत गयी , किससे क्या पूछे | अगली सुबह बड़ी बहू ने उसके चेहरे को पढ़ लिया और उसे अपने कमरे में बुलाया ।
" मेरे चरित्र के बारे में कुछ धारणा बनाने से पहले मेरे पति को भी जान लो , कई कई महीने घर नहीं आता है और वहाँ क्या क्या करता है , ये सबको पता है "।
छोटी बहू स्तब्ध , कुछ कहे उससे पहले ही वो फिर बोली " और हाँ , जब शरीर को ज़रूरत होती है तो सही गलत कुछ नहीं होता "।
मौलिक एवम अप्रकाशित

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Comment by विनय कुमार on May 22, 2015 at 9:51pm

बहुत बहुत आभार आदरणीय शुभ्रांशु पाण्डेय जी..

Comment by विनय कुमार on May 22, 2015 at 9:50pm

बहुत बहुत आभार आदरणीय श्याम नारायण वर्मा जी.

Comment by Shubhranshu Pandey on May 22, 2015 at 9:10pm

आदरणीय विनय जी.

अन्नमय कोष को परिलक्षित करती एक सुन्दर कथा.

सादर.

Comment by Shyam Narain Verma on May 22, 2015 at 11:29am
बहुत उम्दा , बधाई इस लघुकथा के लिए ..
Comment by विनय कुमार on May 21, 2015 at 10:25pm

बहुत बहुत आभार आदरणीय  डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव जी..

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on May 21, 2015 at 9:05pm

छोटी  बहू ही नहीं . पाठक भी स्तब्ध .

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