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तू कितनी अजीज है(कविता)

तू कितनी अजीज है!(ककिता)
कैसे कहें ये दास्ताँ कि तू कितनी अजीज़ है
क्या पता कबआया दिल आजाने की चीज है
उड़ने लगीं हवाएँ जब तेरी जुल्फों से टकरा
तब लगा हर शय तुम्हारे सामने नाचीज है।
दिल को रहें सँभालते दिललगी से डर जिन्हें
लगता हर बंदा जहाँ में हुश्न का मरीज है।
कितनी कलाएँ चाँद की तेरे मुखड़े की बला,
चूमती हो गैर को,देख मुझको तो खीज है।
गड़ गयीं नजरें जहाँ की देख तेरी हर लहर,
भीड़ से रौंदा गया मैं,फट गयी कमीज है।
'मौलिक व अप्रकाशित'

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Comment by Manan Kumar singh on June 2, 2015 at 10:56am

जरूर आ॰ सौरभ पाण्डेयजी। 


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on May 28, 2015 at 10:49am

मननजी, पोस्ट करने के पहले और पोस्ट करने के बाद आप अपनी रचनाओं को देखा करें. वर्ना, आपकी रचना कोई क्यों देखे ?

शुभेच्छाएँ

Comment by Samar kabeer on May 25, 2015 at 3:30pm
जनाब मनन कुमार सिंह जी,आदाब,सुन्दर प्रस्तुति हेतु बधाई स्वीकार करें

कृपया ध्यान दे...

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