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नज़र झुकाई जो इक बार तो उठा न सके- ग़ज़ल

1212 1122 1212 112/22

वो मेरे सामने आने पे मुस्कुरा न सके

नज़र झुकाई जो इक बार तो उठा न सके

 

हज़ार कोशिशें की रश्क़ तो छुपा न सके

मगर हँसी में मेरी बात भी उड़ा न सके

 

उन्होंने जिक्र मेरा छेड़ तो दिया सरे बज़्म

वही बातें मेरे होते वो दोहरा न सके

 

हर एक सम्त से नज़रें उठीं हमारी तरफ

कि कहते कहते भी वो हालेदिल सुना न सके

 

बस एक रोज़ की थी ज़िन्दगानी फूलों की

वो बदनसीब रहे जो चमन सजा न सके

 

न पूछिये मेरी बेचारगी का आलम, आह!

कि आते आते भी ये अश्क़ बाहर आ न सके

मौलिक अप्रकाशित

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सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on July 23, 2015 at 3:44pm

सबसे पहले तो विलंब के लिये मैं आप सभी से मुआफ़ी चाहूँगा कुछ निजी कुछ तकनीकी कारणों से ओबीओ पर सक्रिय नहीं रह पा रहा हूँ।
रचना की सराहना के लिये आप सभी का आभार आदरणीया राजेश दीदी एवं जनाब समर कबीर साहब इस्लाह के लिये तहेदिल से शुक्रिया।


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on June 10, 2015 at 12:17am

खूबसूरत ग़ज़ल के लिए शुभकामनाएँ, शिज्जू भाई..

Comment by shree suneel on June 7, 2015 at 12:27pm
वो मेरे सामने आने पे मुस्कुरा न सके
नज़र झुकाई जो इक बार तो उठा न सके.. ख़ूब
अच्छी ग़ज़ल हुई आदरणीय. बधाई आपको.
Comment by Shyam Narain Verma on June 5, 2015 at 4:04pm
बहुत सुन्दर ग़ज़ल! आपको हार्दिक बधाई!
Comment by Dr Ashutosh Mishra on June 5, 2015 at 2:04pm

वही बातें मेरे होते वो दोहरा न सके....१२१२ यहाँ पर समझ नहीं आया,हर शेर उम्दा   इस रचना के लिए हार्दिक बधाई सादर 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on June 5, 2015 at 10:30am

आदरणीय शिज्जु भाई , आपकी एक और खूबसूरत गज़ल पढ़्ने मिली , आपको हार्दिक बधाइयाँ । 

Comment by विनय कुमार on June 5, 2015 at 12:13am

बहुत बेहतरीन ग़ज़ल , दिली दाद क़बूल करें आदरणीय शिज्जू शकूर जी.

Comment by Mohan Sethi 'इंतज़ार' on June 4, 2015 at 3:08pm

आदरणीय शिज्जू जी बधाई स्वीकार करें ...उम्दा ....

हर एक सम्त से नज़रें उठीं हमारी तरफ

कि कहते कहते भी वो हालेदिल सुना न सके 

Comment by Nilesh Shevgaonkar on June 4, 2015 at 2:21pm

वाह वाह आ. शिज्जू भाई ..बहुत ख़ूब 

Comment by वीनस केसरी on June 4, 2015 at 1:25pm

बहुत खूबसूरत ग़ज़ल है ..

दो मिसरों पर इस्लाह मिल ही गयी है ... अलिफ़ वस्ल से बहर तो सही है मगर अटकाव है तो उसे भी बदलना उचित होगा

कृपया ध्यान दे...

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