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ग़ज़ल ;रिश्तों में जो थीं.. /श्री सुनील

2212 2122 2212

रिश्तों में जो थी दरारें, भरने लगीं
पहले सा मैं, आप तब सी लगने लगीं.

चुप्पी सी थी इक ख़ला सा था बीच में
उम्मीद की वां शुआऐं दिखने लगीं.

अब ये जहाँ तेरी ज़़द में लगता है, लो!
आँचल में तेरे फ़िज़ाऐं छुपने लगीं.

जब फ़ासलों में पड़ीं थोड़ी सिलबटें
ये क़ुर्बतें अपनी सब को खलने लगीं.

तू मेरी होगी, यकीं ये था क्योंकि इन
हाँथो में तुम सी लकीरें बनने लगीं.

किस जज्बे से तुम दुआएं करती हो वां
पहलू से अब यां बलायेें टलने लगीं.


मौलिक व अप्रकाशित

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Comment by shree suneel on June 25, 2015 at 6:34pm
ग़ज़ल की सराहना के लिए बहुत-बहुत शुक्रिया आदरणीय मिथलेश वामनकर सर जी.

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on June 25, 2015 at 2:07am

आदरणीय सुनील जी बधाई इस सुन्दर ग़ज़ल पर 

Comment by shree suneel on June 14, 2015 at 9:01am
ग़ज़ल पसंदगी के लिए बहुत-बहुत शुक्रिया आदरणीय कृष्ण मिश्रा जी. सादर.
Comment by Krish mishra 'jaan' gorakhpuri on June 13, 2015 at 10:46pm

आ० भाई श्री सुनील जी! बहुत ख़ूब! बहुत ख़ूब! मतले पर अलग से दाद प्रेषित है!खूबसूरत गज़ल हार्दिक बधाइयाँ!

Comment by shree suneel on June 11, 2015 at 9:00pm
ग़ज़ल में शिर्कत व सराहना के लिए बहुत-बहुत धन्यवाद आदरणीय गिरिराज सर.

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on June 11, 2015 at 1:32pm

आदरनीय श्री सुनील भाई , खूब सूरत गज़ल के लिये आपको हार्दिक बधाइयाँ ॥

Comment by shree suneel on June 11, 2015 at 11:46am
ग़ज़ल में शिर्कत व सराहना के लिए बहुत-बहुत शुक्रिया आदरणीय भाई नरेंद्र जी.
Comment by narendrasinh chauhan on June 11, 2015 at 11:18am

किस जज्बे से तुम दुआएं करती हो वां
पहलू से अब यां बलायेें टलने लगीं. बहुत खूब

Comment by shree suneel on June 10, 2015 at 11:20pm
ग़ज़ल पे उपस्थिति और सराहना के लिए बहुत-बहुत धन्यवाद आदरणीय सुनील प्रसाद जी. जहां त्रुटियां थीं उसे स्पष्ट करते तो अच्छा होता. सादर.
Comment by shree suneel on June 10, 2015 at 11:07pm
धन्यवाद आदरणीय राहुल दांगी जी.

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