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उंगली में चुनरी लिपटी है दांतों से दबे ओंठ

2212  1212  221  122

दर्पण को देख हुस्न यूं शर्माने लगा है 

लगता खुमारे इश्क उस पे छाने लगा है 

उंगली में चुनरी लिपटी है दांतों से दबे ओंठ 

इक  दिल धड़क धड़क के नगमे गाने लगा है

 

जगते हैं पहरेदार भी आँखों के निशा में 

ख्वावो में उनके जबसे कोई आने लगा है

 

रुक-रुक के सांस चलती है नजरों  में उदासी 

सीने से दिल निकल के जैसे जाने लगा है 

कलियों के साथ देख के भंवरों को वो तन्हा 

कुछ कुछ समझ में माजरा ये आने लगा है

 

कितनी दफा ही आ चुका सावन का महीना 

क्यूँ इस दफा गुलों को यूंँ बहकाने लगा है 

जूही गुलाब चंपा से  जूडा यूंँ   सजाकर

इक गुल हसीं फिजा को ही महकाने लगा है

जुल्फें जो हुस्न ने कभी बांँधी थी जतन से

जुल्फे बही  हवा में क्यूँ लहराने लगा है

मौलिक व अप्रकाशित  

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सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on July 4, 2015 at 8:49pm

आपके ही अंदाज़ की ग़ज़ल हुई है, आदरणीय आशुतोष जी.

शुभ-शुभ


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on June 25, 2015 at 2:43am

आदरणीय डॉ आशुतोष मिश्रा जी, बेहतरीन और ख़ूबसूरत ग़ज़ल हुई है दिल से दाद क़ुबूल फ़रमाऐं ।

Comment by Dr Ashutosh Mishra on June 17, 2015 at 11:09am

प्रिय कृष्णा जी ..रचना पर आपकी स्नेहिल उत्साहित करती प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक धन्यवाद सादर 

Comment by Dr Ashutosh Mishra on June 17, 2015 at 11:02am

आदरणीय समर कबीर जी ..मेरी हर रचना को आपका स्नेह और मार्गदर्शन मिलता है इससे मुझे और मुझ जैसे नए लिखने वालों को बहुत सम्यक जानकारी हासिल होती है ..मैं आपके मार्गदर्शन के अनुरूप संसोधन का प्रयास करूंगा ..ह्रदय से धन्यवाद के साथ सादर 

Comment by Krish mishra 'jaan' gorakhpuri on June 14, 2015 at 8:54pm

बेहतरीन मतला के साथ सुन्दर गज़ल हुयी है आ० आशुतोष सर!हार्दिक बधाई!

Comment by Samar kabeer on June 12, 2015 at 3:25pm
जनाब डॉ आशुतोष मिश्रा जी,आदाब,अच्छी और ख़ूबसूरत ग़ज़ल के लिये दाद के साथ मुबारकबाद क़ुबूल फ़रमाऐं ।

"तय दिल धड़क धड़क के नगमे गाने लगा है"

इस मिसरे की लय में रूकावट महसूस हो रही है ,देख लीजियेगा ।

"कितने दफा ही आ चुका सावन का महीना
क्यूँ इस दफा गुलों को यूं बहकाने लगा है"

दफ़ा स्त्रीलिंग है इसलिये ऊला मिसरे में कितने की जगह कितनी करना उचित होगा ।
Comment by Dr Ashutosh Mishra on June 12, 2015 at 1:37pm

आदरणीया कांता जी ..रचना आपको पसंद आयी .मेरा प्रयास सार्थक हुआ ..आपकी उर्जा प्रदान करती प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक धन्यवाद सादर 

Comment by Dr Ashutosh Mishra on June 12, 2015 at 1:35pm

आदरणीय नरेन्द्र जी रचना पर आपकी स्नेहिल प्रतिक्रिया के लिए तहे दिल धन्यवाद सादर 

Comment by Dr Ashutosh Mishra on June 12, 2015 at 1:34pm

आदरणीय गोपाल सर ..आपके आशीर्वाद से मन गदगद हो गया आपके स्नेह से ही ये सब संभव हो पाता है सादर प्रणाम के साथ 

Comment by kanta roy on June 11, 2015 at 10:31pm
रुक-रुक के सांस चलती है साँसों में उदासी 
सीने से दिल निकल के जैसे जाने लगा है.......
हर एक शेर लाजवाब बनी है ....... पूरे गजल में जैसे खुमार चढी है .......वाह !!! क्या बात है आदरणीय डा. आशुतोष मिश्रा जी .... पढकर हम भी लाजवाब हो गये है ।

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