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बह्र : २२ २२ २२ २

 

पैसा जिसे बनाता है

उसको समय मिटाता है

 

यहाँ वही बच पाता है

जिसको समय बचाता है

 

चढ़ना सीख न पाये जो

कच्चे आम गिराता है

 

रोता तो वो कभी नहीं

आँसू बहुत बहाता है

 

बच्चा है वो, छोड़ो भी

जो झुनझुना बजाता है

 

चतुर वही इस जग में, जो

सबको मूर्ख बनाता है

-----------

(मौलिक एवं अप्रकाशित)

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Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on July 6, 2015 at 6:13pm

बहुत बहुत शुक्रिया आदरणीय सौरभ जी


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on July 4, 2015 at 8:47pm

उम्दा ग़ज़ल हुई है, आदरणीय धर्मेन्द्रजी. शुभ-शुभ

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on June 27, 2015 at 10:20am
बहुत बहुत शुक्रिया आदरणीय मिथिलेश जी

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on June 25, 2015 at 2:45am

आदरणीय बड़े भाई धर्मेन्द्र जी बहुत बढ़िया ग़ज़ल हुई है 

दिल से दाद कुबूल फरमाएं.....

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on June 13, 2015 at 4:05pm
बहुत बहुत शुक्रिया जनाब समर साहब
Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on June 13, 2015 at 4:03pm
बहुत बहुत शुक्रिया आदरणीय सुनील जी
Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on June 13, 2015 at 4:02pm
बहुत बहुत शुक्रिया आ. गिरिराज जी
Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on June 13, 2015 at 3:57pm
शुक्रिया वीनस भाई
Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on June 13, 2015 at 3:57pm
बहुत बहुत शुक्रिया आदरणीय गोपाल नारायन जी
Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on June 13, 2015 at 12:45pm
बहुत बहुत शुक्रिया आ. विजय शंकर जी

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