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पुलक तरंग जान्हवी

पुलक तरंग जान्हवी,
हरित ललित वसुंधरा,
गगन पवन उडा रहा है
मेघ केश भारती।

श्वेत वस्त्र सज्जितः
पवित्र शीतलम् भवः
गर्व पर्व उत्तरः
हिमगिरि मना रहा।

विराट भाल भारती
सुसज्जितम् चहुँ दिशि
हरष हरष विशालतम
सिंधु पग पखारता।

कोटि कोटि कोटिशः
नग प्रफ़्फ़ुलितम् भवः
नभ नग चन्द्र दिवाकरः
उतारते है आरती।

ओम के उद्घोष से
हो चहुँदिश शांति
हो पवित्रं मनुज मन सब।
और मिटे सब भ्रान्ति।

मौलिक एवं अप्रकाशित
आदित्य कुमार

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सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on July 13, 2015 at 4:18pm

आपका सदैव स्वागत है.  साथ ही, आपसे निवेदन है कि आप इसी मंच के  भारतीय छन्द विधान ग्रुप में पोस्ट हुए आलेखों को आवश्यकतानुसार देख जायें. परन्तु, सर्वप्रथम आप इअ मंच पर रेगुलर होेइये. अन्यथा आप की तारतम्यता ही नहीं बन पायेगी. इसी मंच के ’चित्र से काव्य तक’ छन्दोत्सव के आयोजन में हिस्सा लें. आपको अवश्य छन्द लाभ होगा.

Comment by Aditya Kumar on July 13, 2015 at 3:36pm

आदरणीया  MAHIMA SHREE जी आप को कविता अच्छी लगी जानकर मुझे भी बहुत प्रसन्नता हुयी।  आप का हार्दिक धन्यवाद एवं आपका सदैव स्वागत है। 

Comment by Aditya Kumar on July 13, 2015 at 3:31pm

हार्दिक धन्यवाद आदरणीय भैया  Saurabh Pandey  जी।  मै इसे सीख कर ही रहूँगा जहाँ रुकावट आई फिर आप से ही पूछूंगा।  

Comment by MAHIMA SHREE on July 12, 2015 at 5:30pm

वाह ...आपको पढ़ कर मन प्रफुल्लित हो गया....इस प्रवाहमयी रचना के लिए बहुत बधाई आपको


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on July 4, 2015 at 10:16pm

भलेही नैसर्गिक प्रयास या प्रभावित हुए प्रयास से यह रचनाकर्म हुआ है, किन्तु श्लाघनीय है. इस हेतु बधाई, भाई आदित्यजी.

प्रमाणिका, पञ्चचामर तथा अनंगशेखर छन्दों में पदों में  लघु-गुरु की आवृति चलती है. लेकिन वहाँ लघु के बाद गुरु का क्रम होता है. आपने गुरु के बाद लघु का क्रम रखा है. यह तूणाक या चामर छन्द (७, ८) का कारण बनता है. इसमें पद गुरु वर्ण से ही समाप्त होता है.
दूसरे, आपने गुरु के स्थान पर कई बार द्विकलों का प्रयोग किया है जो कि ऐसे छन्दों के शुद्ध रूप में मान्य नहीं है. वैसे, वीर तुम बढ़े चलो, धीर तुम बढ़े चलो   का उदाहरण लिया जा सकता है, जहाँ, उर्दू बहर के अनुसार गुरु की जगह द्विकल (दो समवेत लघु) को लेने की छूट ली गयी है.

लेकिन मैं आपसे इतना क्यों कह रहा हूँ ? क्योंकि आपमें छन्दों के प्रति ललक दिख रही है. तभी आप ऐसे शब्द-कौतुक कर पाये हैं.

रचना के कथ्य पर विशेष कुछ नहीं कहना है.
शुभेच्छाएँ

Comment by Aditya Kumar on July 4, 2015 at 6:42pm

मै OBO का  हृदय तल से धन्यवाद करता हूँ, पहली बार मेरी एक रचना फीचर हुयी है। मेरे लिए यह उल्लास  का विषय है।  आदरणीय श्री  Er. Ganesh Jee "Bagi" जी उत्साह वर्धन के लिए आप का हार्दिक धन्यवाद।  


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on July 4, 2015 at 4:08pm

आदरणीय आदित्य जी, आपकी कविता अच्छी हुई है और फलस्वरूप इस मंच पर फीचर हुई, बहुत बहुत बधाई.

Comment by Aditya Kumar on June 22, 2015 at 1:04pm

आदरणीया  kanta roy जी आपको हुयी अनुभूति ही मेरे लिए उत्साह वर्धन है , साभार ....

Comment by Aditya Kumar on June 22, 2015 at 12:59pm

आभार आदरणीय   krishna mishra 'jaan'gorakhpuri जी

Comment by kanta roy on June 15, 2015 at 12:43pm
अद्वितीय अनुभूति हुई इस कविता को पढकर । वाह !!! बधाई स्वीकार करें इस कविता के लिए आदरणीय आदित्य कुमार जी

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