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"खुदा का कहर तो खुदा का ही है पर ये सब तो हमने किया। टूटे हुए आशियाने, स्याह काले रंगों में बदलती हरियाली और उपजाऊ जमीन को बंजर करती बारूदी तबाही। आखिर दहशतगर्दी को ख़त्म करने के लिए क्या यही एक रास्ता था?" अपनी 'कमांडरशिप' में किये 'आपरेशन' के बाद इलाके को एक नज़र देखते हुए वो सोच रहा था।
इस वीरान धरती को देख, इस खेल में खुद की हिस्सेदारी के लिए, बतौर इनाम लगे तमगे भी अब उसे चुबने लगे थे। मन का बोझ जब खुद का भार सहने में नाकाम हो गया तो अश्को के रस्ते बह निकला। फलक की और देखता हुआ वो कह उठा। "ऐ मेरे मौला मुझे मुआफ़ करना, तेरी इस विरासत को तबाह करने का ख़तावार मैं ही हूँ।"
"नहीं मेरे अजीज! तूने तो अपने हिस्से का फ़र्ज़ अदा किया है।" फलक भी उसके अश्को को पोंछता हुआ बोल उठा। "शैतानी बुराई का ख़त्म करने के लिए अक्सर बहुत कुछ कुर्बान करना ही पड़ता है। और रही बात कुदरत की, तो इसका जवाब तो तेरे कदमो तले कुदरत ने खुद ही दे दिया है।"
उसने गीली आखों से नीचे देखा। बंजर तबाह जमीन पर एक ठूंठ से निकला हुआ नया कोमल पत्ता फिर से नए जीवन की घोषणा कर रहा था।

"मौलिक और अप्रकाशित"

'वीरेंदर वीर मेहता'

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सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on July 4, 2015 at 10:28pm

प्रकृति की मूल अवधारणा को शब्दों में स्थापित करती इस लघुकथा के लिए बधाई भाईजी.


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on June 25, 2015 at 3:00am

बहुत सुंदर लघुकथा ,आदरणीय वीरेंदर जी

Comment by Krish mishra 'jaan' gorakhpuri on June 14, 2015 at 11:22pm

''बहुत कुछ खोना पड़ता है कभी कभी बुराई के खात्मे में'' बहुत सुन्दर लघुकथा हुयी है आ० वीरेन्द्र जी हार्दिक बधाई!

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on June 14, 2015 at 9:33am

बहुत सुंदर लघुकथा ,आदरणीय मेहता जी. सच बुराई को ख़त्म करने के लिए बहुत कुछ दाव पर लगता है. बधाई स्वीकारें

Comment by VIRENDER VEER MEHTA on June 13, 2015 at 10:31pm
प्रोत्साहन के लिये आपका हार्दिक आभार आद: डा: गोपाल नारायण जी। भविष्य में भी आपके स्नेह की आकांशा लिये आपका अनुज।
Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on June 13, 2015 at 8:32pm

वीरेंद्र जी

अच्छी सोच और अच्छी कथा .

Comment by विनय कुमार on June 13, 2015 at 5:31pm

बेहद शानदार अभ्व्यक्ति । बहुत कुछ खोना पड़ता है कभी कभी बुराई के खात्मे में । आप की रचनाएँ पढ़ने में एक अलग ही सुकून मिलता है । बहुत बहुत बधाई इस रचना लिए आदरणीय Veer Mehta जी ..

Comment by VIRENDER VEER MEHTA on June 13, 2015 at 4:13pm

उत्साह बढाने के  लिए  तहे दिल से आभार आदरणीय डॉ विजय शंकर जी ..

Comment by Dr. Vijai Shanker on June 13, 2015 at 3:49pm

प्रेरक , बधाई, आदरणीय वीरेंद्र जी. 

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