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उमस(सोमेश कुमार)

उमस(सोमेश कुमार )
“ आज तो चलना है ना, “सरोजनी नगर मार्किट ” पल्लवी ने थोड़ा नाराजगी भरे लहजे में कहा
”हाँ-हाँ बाबा,पक्का, कसम से ” आयाम बोला
“कब ?”
“काम निपटा लो, फिर चलते हैं ११-१२ बजे तक”
१०.३० बजे नाश्ता करने के बाद बिस्तर पर उंघते हुए- “पल्लवी , कैंसिल करते हैं याsर, सोने का मन कर रहा है| उमस भी है|सारा बदन –चिपचिप-चिपचिप हो रहा है | “
“हाँs , ना तो ये उमस कम होगी और ना ही तुम्हारे मन की उमस जाएगी |अब भी तो वही है तुम्हारे ख्यालो में- - - - तुम्हें शीतल करती, मैं तो बस उमस हूँ |
“क्या बकवास करती हो ?वो मेरा अतीत है और तुम मेरा वर्तमान |मैं जब-जब उसे भूलने की कोशिश करता हूँ तुम - - - - -शssट”नाराजगी से गर्दन हिलाता है |”
“अगर ऐसा नहीं है तो डिब्बे में क्यों बंद रहते हो ?क्यों बस किताबों-कहानियों तक सिमटे हो ?क्या तुम्हें समझ नहीं आता कि मेरे भी कुछ अरमान है ?तुम तो अपनी कहानी-किताबों से संतुष्टि पा लेते हो पर मेरी इच्छाओं का क्या ?”
“क्या मैं तुम्हें प्यार नहीं करता ?” |
“क्या माँगने पर रुपए दे देना और रात में बिस्तर साँझा करना इसी को तुम प्यार समझते हो ?”
“तो तुम्हें ये सब क्या लगता है ?”
“नौकरी यानि की बेमन से किया जाने वाला काम - - - - -“
“पर मेरे मन में तो कभी ऐसा ख्याल नहीं आया| शायद तुम्हीं - - - - “कहते-कहते रुक जाता है |”
“हाँ,मुझे ऐसा ही लगता है |बनाना-खिलाना और साथ में सो जाना-नथिंग बट अ फुल टाइम सर्वेंट |”

मेरी तो कोई परवाह ही नहीं |मैं तो बस एक नौकरानी हूँ-बनाओ-खिलाओ और साथ में सो जाओ |”

“क्या हनी ! तुम्हारी रेलगाड़ी है कि रूकती ही नहीं !ऐसे तो एक्सीडेंट हो जाएगा |”थोड़ा लाड से कहता है
“हाँ-हाँ,मैं तो हूँ हि एक्सीडेंट !ऐसा है तो छोड़ क्यों नहीं देते मुझे !और जहाँ तुम्हारी गाड़ी सेफ़ चले,वहीं चले जाओ |”
“उफ्फ यार !तुम तो बड़ी जल्दी बुरा मान जानती हो |”
“तो और क्या करूं ?पिछले एक महीने से सरोजनी मार्किट ले जा रहे हो और जब चलने का वक्त आता है तो कोई ना कोई बहाना-कभी गर्मी-कभी बारिश-कभी उमस तो कभी तुम्हारे दोस्त - - -“मुँह फुलाकर दूसरी और देखने लगती है |
“अच्छा चलो,रैडी हो जाओ,उत्तमनगर मार्किट चल लेते हैं |दूर भी नहीं जाना पड़ेगा और तुम्हारी शोपिंग भी हो जाएगी |
“क्या उत्तमनगर !क्यों ?”
“मैं अरविन्द जी के साथ बैठ कर गप्प-शप्प कर लूँगा और तुम उनकी वाइफ के साथ शोपिंग |”
“|मैं तुम्हें झल्ली लगती हूँ |क्यों जाऊ मैं मिस.अरविन्द के साथ ? साफ़-साफ़ बोलों कि मेरे साथ चलना तुम्हें पसंद नहीं |”
ये कहते हुए धम्म से बिस्तर पर गिर जाती है और सुबकने लगती है |
“यार सुनो तो ,मेरा वो मतलब नहीं था |आँखों से ये गंगा-जमुना मत बहाओ |”उसका हाथ पकड़ते हुए कहता है |
“छोड़ दो मुझे !” हाथों को खींचकर मुँह तकिए से ढक लेती है |
“अच्छा चलो,अगर तुम्हारी यही जिद्द है तो सरोजनी मार्किट ही चलते हैं |मैं तो बस कह रहा था इतनी उमस में इतनी दूर |”तकिया हटाकर उसके बालों को सहलाता है |
“अरे ये क्या !उ sमस !बा sढ़ !”उसकी नाक को छूते हुए हँसता है |
“सूssऊँ “नाक खींचती हुई उसकी छाती पर मुक्का मारती है |

फिर कुछ देर बाद मोटर-साईकिल पे बैठते हुए आयाम बोला - “यार कितनी उमस है! बादल भी चले आ रहें हैं.....बारिश हुई तो फँस जाएँगे | ”
पर पल्लवी ने कोई प्रतिक्रिया नही दी |
फिर कुछ दूर जाते ही - “टप-टप,” टिप-टिप,” ‘तड़-तड़ ‘
“अरे आप भीग रहे हो, बीमार पड़ जाओगे, चलो कहीं रुक जाते हैं |“ पल्लवी ने चिंतित होकर कहा |
“मेरी फ़िक्र मत करो |मुझे भीगने की आदत है |एण्ड यू नो –आई लव दि रेन |”
पर शरणार्थीयों से खचाखच भरे बस-स्टाप के पास गाड़ी का ब्रेक लगा देता है |
“गाड़ी क्यों रोकी ?”
“अरी !मेरी छुई-मुई |ज़्यादा भीग गई तो अभी तुम्हारी-‘आक्षी –आक्षी’ |“
तभी आऽक्शि |
दोनों हँसते हुए बस-स्टॉप की शेड की भीड़ में दाखिल हो जाते हैं|
बारिश धीमे होते ही बाईकों का कारवाँ चल पड़ता है और वो भी उसमे शामिल हो जाते हैं | कुछ ही दूर गए थे कि फिर से-‘टिप-टिप-टिप –टिप ,तड़-तड़-तड़-तड़’
“कहता था ना कि बारिश में फँस जायेंगे” अब वो मेट्रो-पुल की शेड के नीचे थे |
फिर बारिश धीमें होते ही बाईक स्टार्ट करते हुए –“ अब फिर से मिली तो वापस घर |”
थोड़ी ही दूर गए थे कि फिर से मुसलाधार बारिश शुरु हो जाती है |आयाम यू टर्न लेता ही है कि पल्लवी चहकते हुए बोलती है- चलो छोड़ो बाज़ार-वाज़ार,कितना रोमेंटिक मौसम है,चलो कहीं और चलते हैं|
“इस वक्त !कहाँ ?”.
“इंडिया-गेट |”
“पागल हो,तुम्हरी तबीयत - - - -,”
“कुछ नहीं होगा-प्लीज़-प्लीज़ |” बच्चों की तरह पीठ पर मुक्का मारती है |
बाईक इंडिया-गेट की तरफ भागने लगती है|

”थोड़ा धीरे चलाओ, जल्दी किस बात की है ,घर थोड़े ही जा रहे है,मन भर भीग तो लें |” पल्लवी ने डांटने के अंदाज़ में कहा
“मुझे ठण्ड लग रही है |”
“झूठ बोले कउआ काटे(गाते हुए )
यूँ क्यों नहीं कहते कि मूड रोमंटिक हो रहा है “ कहते हुए आयाम को पीछें से भींच लेती है |
“अब भी,ठंड लग रही है|बदन मा बड़ी आग है(गुनगुनाते हुए ) “ पूछती है
“सब देख रहे हैं |” कुछ झिझक के साथ बोलता है
“देखने दो, हम पति-पत्नी हैं |”
फिर हाथ उठाकर जोर से गाने लगती है –“ आज मैं ऊपर आसमाँ नीचे.....”
इण्डिया गेट के नजदीक चाय का ठेला देखकर चिल्लाते हुए -“वाव टी !चलो पर्स दो |”
और चाय लेने दौड़ पड़ती है |बारिश बंद हो चुकी होती है पर बादलों का बुंद-बुंद टपकना जारी रहता है |


चाय लेकर,आयाम की तरफ बढ़ाते हुए-“एक गरम चाय की प्याली हो |कोई उसको पिलाने वाली हो |”
तभी ‘डिsप’ एक बुंद आकर उसके कप में गिरती है |
“लो तुम्हारी चाय में तो पानी पड़ गया |” आयाम छेड़ते हुए कहता है |
“पानी नहीं मेरे हनी,अमृत,वो क्या लिखते हो तुम –वो पक्षी वो विशेष बादल - - -“दिमाग पर जोर डालती है
“मे आई हेल्प यू |”चाय का घूंट भरते और मुस्कुराते हुए पूछता है |
“नो-नो ,आई एम ग्एटिंग,होल्ड दिस |”अपना कप भी उसे पकड़ा देती है |
तभी फिर ‘डsप’
“हाँss,चातक और स्वाति नक्षत्र की बुंद |” कहकर आयाम से अपना कप लेकर सुड़कने लगती है और आयाम उसे देखकर मुस्कुराने |

फिर चाय पीते हुए –“पता है आपको, मैं पहले कभी इतना नहीं भीगी ....”
“और इस तरह मैं भी नहीं”- उसकी आँखों में आँखे डालकर कहता है |वो आँखे झुका लेती है |
उमस कुछ कम हो चली थी पर बादलों की पकड़म-पकड़ाई जारी थी |
फिर घर की तरफ लौटते हुए, सड़क पर जगह-जगह खड़े पानी में जब आयाम बाईक धीमी करता है तो कुछ बावलेपन से बोलती है –“ क्या करते हो, कपड़े तो गीले हो ही गए हैं |अब कुछ छींट ही तो पड़ेगी |समझ लेंगे होली खेल ली |वैसे भी होली के दिन तो आपको दोस्तों से ही....”
घर से कुछ ही मीटर दूर रह गए थे की- घर्र-घर्र, घुर्र-घुर्र घूऽ और बाईक बंद |
“शायद पानी चला गया है इंजन में, तुम घर चलों ,मैं इसे मैकेनिक से स्टार्ट कराके आता हूँ | वैसे भी फिर से बारिश होने लगी है |”
“क्यों जाsऊ, बेशक से इक्कीसिवी सदी की हूँ पर प्यार सोलहवी सदी का ही है मेरा |चलो मैं भी मदद करती हूँ |” और वो पीछे से गाड़ी धकेलने लगती है |
आयाम गुनगुनाने लगता है-“तेरा साथ है कितना प्यारा-तुझ पे अपना जीवन वारा |तेरे मिलन की लगन में- - -“
पीछे से पल्लवी से ऊँची आवाज़ में साथ देते हुए –“हमे आना पड़ेगा दुनिया में दोबारा |”
दोनों खिलखिला के हँस पड़ते हैं |
जोर से हवा चलने लगती है ,बादल उड़ने लगते हैं और उमस - - - |

सोमेश कुमार(मौलिक एवं अप्रकाशित )

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सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on July 16, 2015 at 3:13am

आदरणीय सोमेश भाई, इस रचना से गुजरा हूँ मगर सरसरी तौर पर. कहानी लम्बी थी और बहुत सारी रचनाओं पर कमेन्ट करना था क्योकिं मैं ओबीओ से लगभग 20-25 दूर रहा. इसलिए रचना को गंभीरता से पढ़ नहीं पाया और कमेन्ट वैसे देना उचित नहीं था,

आज पुनः रचना पर उपस्थित हुआ हूँ और चकित हूँ आपकी रचना पढ़कर, जिस सधे ढंग से आपने कथानक के एक एक कथ्य को शाब्दिक किया है मुग्ध हूँ. एक अनुभव की तरह गुजरा हूँ इस कहानी से. आपकी संभावनाएं गद्य में स्पष्ट दिखाई देने लगी है. एक बेहतरीन कहानीकार को इस मुग्ध करती कहानी पर बहुत बहुत बधाई 


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on June 25, 2015 at 2:06am

तुलनात्मक निर्णय की तरह न भी लें तो आप अपनी गद्य-पस्तुतियों में कमाल रच सकने की क्षमता रखते हैं, सोमेश भाई.
मुझे आपकी एक लम्बी (ओबीओ के हिसाब से) कहानी याद आ रही है. मैं उस कहानी से जैसे चिपक गया था, जबतक पूरा नहीं कर लिया रुका ही नहीं. ऐसी लम्बी प्रस्तुतियों में पाठक को बाँध लेना खेल नहीं है. यह अलग बात है कि उस कथा पर पाठकों की गिनती की प्रतिक्रियाएँ तक नहीं आयी थीं. यह इस मंच के सक्रिय पाठकों की  कैसी आदत है या कैसी विवशता है, इस पर मैं स्वयं दंग हूँ.  खैर..

इस कथा में भी आपका विन्यास कई जगह कौंध जाती बिजली की तरह जगरमगर कर देता है. पठन-पाठन का गंभीर शौक रखने वाले एक युवा पति तथा अपनी वयस-सुलभ मनोभावनाओं को आवश्यक आकाश देने को छटपटाती उसकी पत्नी के बीच के आत्मीय किन्तु अव्यक्त रह जाने के कारण लगातार घुटते हुए सम्बन्ध को जिस दायित्व के साथ आपने अभिव्यक्त किया है वह आपकी संवेदनशील दृष्टि और गहन निरीक्षण-क्षमता का परिवायक है.

यह अवश्य है कि कथा-विन्यास में पारस्परिक संवादों को अभिव्यक्त करना सदा से कठिन प्रतीत होता रहा है. विशेषकर नये लेखकों को. पात्रों के नाम के साथ ’उसने कहा’, ’वह बोली’, ’वह बोला’ लिख कर संवादों को प्रस्तुत करना प्रवाह को लचर कर देता है. इसके निराकरण का सुन्दर उपाय यह है कि क्रिया और भंगिमा को संवादों के साथ जोड़ दिया जाय. इस तरह, ’उसने कहा’, ’वह बोली’ जैसे वाक्यों की आवश्यकता ही नहीं रह जायेगी. सर्वोपरि, ऐसे वाक्यों की आवश्यकता ही क्यों पड़ती है ? किनके बीच संवाद हो रहा है का वर्णन होते ही इन्वर्टेड कॉमा के साथ लिखते हुए चलें. उन्हें समझने का काम पाठकों पर छोड़ दें, कि कौन सा वाक्य कौन कह रहा है ! किन्तु इसके पहले भावदशा को अभिव्यक्त करने का गहन अभ्यास हो जाय. इस हेतु प्रयासरत रहने की आवश्यकता है.

प्रस्तुत कहानी अच्छी है. इसे आवश्यक हल्का-फुल्का रखने का रोचक प्रयास मोहता भी है. फ़िल्मी गीतों का बहुत ही बढिया उपयोग हुआ है. इन सबके लिए धन्यवाद और शुभकामनाएँ.


अलबत्ता, आप नये हैं लेखक है यह सत्य बुलबुले की तरह सतह पर बार-बार आता रहता है.. हा हा हा.. ..
खैर, आपका दीर्घकालीन अभ्यास ऐसे सारे अनगढ़पन को समाप्त कर देगा, इसकी आश्वस्ति भी है.
सतत लगे रहें.
शुभेच्छाएँ

Comment by somesh kumar on June 18, 2015 at 8:07am
बदली जो हट जाए तो
किरणें पहुँचेंगी घर-द्वार
प्रेम ही होता जीवन सुख
बाकि सब जीवन व्यापार
आभार केवल प्रसाद जी,विजय शंकर जी एवम् आशुतोष मिश्रा जी
Comment by Dr Ashutosh Mishra on June 17, 2015 at 2:59pm

इस सुंदर रचना के लिए हार्दिक बधाई सादर 

Comment by Dr. Vijai Shanker on June 17, 2015 at 10:53am

जिंदगी सिर्फ चिंतन का विषय नहीं है, कभी - कभी सब भूल कर सिर्फ जी भी लेना चाहिए. बहुत सुन्दर प्रस्तुति, बधाई, आदरणीय सोमेश कुमार जी।   सादर. 

Comment by केवल प्रसाद 'सत्यम' on June 16, 2015 at 10:06am

सहयोग में सभी विकार धुल जाते हैं. सुंदरकथा. बहुत-बहुत बधाई. आ0 सोमेशभाई जी.

Comment by somesh kumar on June 16, 2015 at 10:03am
कृष्णा भाई,उत्साहवर्धन व् समय देने के लिए शुक्रिया।
समझता हूँ कि इस व्यस्त समय में सारे दायित्त्व निभाते हुए साहित्य को समय देना आसान नहीं है
।विशेष तौर पर हर बार बाकि सदस्यों की पोस्ट पर टिप्पणी।स्वयम इसी समस्या से जूझ रहा हूँ।इसलिए शिकायत नहीं प्रेम निवेदित है
Comment by somesh kumar on June 16, 2015 at 9:56am
आपका वरदहस्त मिला आ.गोपाल एवम् शरदेन्दु जी तो नई ऊर्जा प्राप्त हुई/इसे बनाए रखें
आपका अनुज
Comment by Krish mishra 'jaan' gorakhpuri on June 16, 2015 at 8:11am

बहुत ही बेहतरीन लिखा है आ० सोमेश भाई आपने,क्या कहने!आप की रचनाओं पर समयाभाव के कारण आजकल नही आ पा रहा था.आज आपकी इस रचना पर आकर मन गदगद हो गया!हार्दिक बधाई व् शुभकामनाए!


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by sharadindu mukerji on June 16, 2015 at 3:38am
भाई सोमेश जी, आप ऊर्जावान हैं. आपकी कलम से हमारी बहुत मांग है, बहुत अपेक्षाएँ हैं. निरंतर प्रयास में लगे रहें. शुभकामनाएँ.

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

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