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“माँ तू खुद ही तो कहती है वो दरोगा अच्छा आदमी नहीं हैं और हम दोनो बहनों को उस से दूर ही रखती है.. फिर तू खुद वहाँ क्यों जाती है.., बचपन से देखती चली आ रहीं हूँ बापू के गुजरने के बाद से  तू नियम से उसका खाना लेकर जाती है और देर रात वापस लौटती है. लोग कैसी कैसी बातें बनाते हैं.” बरसों से मन में घुमड़ते प्रश्न आज आखिर मदुरा ने माँ के सामने रख ही दिए..

“वो हमारा अन्नदाता है तो बदले में कुछ तो उसको भी देना ही होता है.” माँ ने बड़े शांत-भाव से उत्तर दिया और खाने का डिब्बा उठा कर गंतव्य की ओर बढ़ गई..

.

मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment by Seema Singh on July 9, 2015 at 6:43pm

आभार विजय निकोरे जी एवं सौरभ पाण्डेय जी आप गुणी जनों की सराहना बहत उर्जा प्रदान करती है...धन्यवाद सर.


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on July 9, 2015 at 1:06am

ये जीवन है, इस जीवन का यही है .. ऐसा ही है .. रंग-रूप !

आदरणीया सीमाजी, हार्दिक बधाई..

Comment by vijay nikore on July 6, 2015 at 2:48am

 उफ़ ... इतना अनकहा सच ! इस अनकहे सच को आपकी लघु कथा ने निपुणता से सामने रखा है।

आपको हार्दिक बधाई, आदरणीया सीमा जी।

Comment by maharshi tripathi on July 5, 2015 at 9:40pm

पंचलाइन ,,बहुत बढ़िया है,,,बधाई आपको |

Comment by Seema Singh on July 4, 2015 at 7:50am
आभार श्री सुनील जी ।
Comment by shree suneel on July 4, 2015 at 7:44am
बेबस.. मगर समझदार थी जो बेटियों को दूर रखी उस शख्स से.
बधाई आपको इस समर्थ लघु-कथा के लिए आदरणीया.
Comment by Seema Singh on July 4, 2015 at 5:09am
बहुत बहुत धन्यवाद मिथिलेश जी...

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on July 3, 2015 at 6:35pm

अभी नाम सुधार के फिर से आपको बधाई दे देता हूँ आदरणीया ।

आदरणीया सीमा जी , अच्छी लगी आपकी लघुकथा , एक मज़बूर की सच्चाई ।

Comment by Seema Singh on July 3, 2015 at 6:30pm
आभार आ0गिरिराज जी सर.. परन्तु मई सीमा हूँ मीना नही.. :)

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on July 3, 2015 at 6:24pm

आदरणीया मीना जी , अच्छी लगी आपकी लघुकथा , एक मज़बूर की सच्चाई ।

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