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अधूरी इच्छा (लघुकथा)

बाबूजी जी के श्राद्ध कर्म में वे सारी वस्तुएं ब्राह्मण को दान में दी गयी जो बाबूजी को पसंद थे. शय्या-दान में भी पलंग चादर बिछावन आदि दिए गए. ऐसी मान्यता है कि स्वर्ग में बाबूजी इन वस्तुओं का उपभोग करेंगे. लोगों ने महेश की प्रशंशा के पुल बांधे।

"बहुत लायक बेटा है महेश. अपने पिता की सारी अधूरी इच्छाएं पूरी कर दी."
"पर दादाजी को इन सभी चीजों से जीते जी क्यों तरसाया गया?"- महेश का बेटा पप्पू बोल उठा.

.

(मौलिक व अप्रकाशित )

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Comment by JAWAHAR LAL SINGH on July 18, 2015 at 8:23am

आदरणीय सौरभ सर, आपकी उत्साह वर्धक प्रतिक्रिया से मन प्रफुल्लित हो गया ...सादर!


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on July 16, 2015 at 9:01pm

आदरणीय जवाहर भाईकी इस लघुकथा के बरअक्स आदरणीय गिरिराज भाईजी का शेर -
रहा जब तक सुनी तुमने नहीं,  जिस शख़्स की यारो
लिपट कर आज रोना क्यूँ , कि वो उत्तर नहीं देता ॥  

दोनों ग़ज़ब ! हार्दिक बधाई, भाई..

Comment by JAWAHAR LAL SINGH on July 8, 2015 at 10:23pm

हार्दिक आभार आदरणीय विजय निकोर साहब!

Comment by JAWAHAR LAL SINGH on July 8, 2015 at 10:23pm

हार्दिक आभार आदरणीय ओमप्रकाश क्षत्रिय जी! आपका सुझाव सर आँखों पर!

Comment by JAWAHAR LAL SINGH on July 8, 2015 at 10:21pm

सकारात्मक और उत्साहवर्धक प्रतिक्रिया के लिए आभार आदरणीय विजय कुमार सिंह जी!

Comment by vijay nikore on July 8, 2015 at 9:49am

अति संवेदनशील लघु कथा ! हार्दिक बधाई।

Comment by Omprakash Kshatriya on July 8, 2015 at 7:24am

आदरणीय JAWAHAR LAL SINGH  जी बहुत ही सुन्दर लघुकथा. आजकल के ढकोसलों पर . बधाई

केवल प्रशंशा  को प्रशंसा कर लीजिए .

Comment by विनय कुमार on July 7, 2015 at 10:26pm

बुज़ुर्ग तो अतृप्त ही स्वर्ग सिधार जाते हैं और बाद में ये सब ढोंग लोगों को दिखाने के लिए हटा है | सुन्दर लघुकथा , बधाई आदरणीय..

Comment by JAWAHAR LAL SINGH on July 7, 2015 at 7:44pm

आदरणीय अग्रज तुल्य कुशवाहा जी, हम सभी लोक-लाज के लिए बहुत सारी प्रथाओं का अन्धानुकरण करते हैं ... कम से कम जीते जी किसी बुजुर्ग को तकलीफ न हो ...प्रयास यही होना चाहिए ...पर ????

Comment by JAWAHAR LAL SINGH on July 7, 2015 at 7:41pm

जी आदरणीया कांता रॉय जी मैं भी सीख ही रहा हूँ बस आपलोगों ने मान दिया यही काफी है ...जबकि तथ्य से हम सभी वाकिफ हैं ...अगर वहां असर हो वही काफी है सादर!

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