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बड़े से मंदिर की बड़ी सी मूर्ति के सामने हाथ जोड़कर खड़े एक बड़े आदमी ने कहा, "भगवन, हम सब जानते हैं कि प्रकृति उसी का चुनाव करती है जो सबसे शक्तिशाली होता है। जो प्रजाति कमजोर होती है और अपनी रक्षा नहीं कर पाती वो मिट जाती है। इस तरह सीमित संसाधनों का सबसे शक्तिशाली प्रजातियों द्वारा उपयोग किया जाता है और उसी से ये दुनिया विकसित होती है। तो भगवन मैंने जो मज़दूरों, गरीबों, कमजोरों और लाचारों का अपने फ़ायदे के लिए इस्तेमाल किया है वो मैंने एक तरह से प्रकृति की मदद ही की है। ऊपर से मैंने आपका ये विशालकाय मंदिर बनवाकर जो महान कार्य किया है उसकी वजह से मेरे इन छोटे मोटे पापों को तो आप निश्चित ही क्षमा कर देंगे।"

मूर्ति से आवाज़ आई, "एक समय था जब धरती पर डायनासोर सबसे शक्तिशाली प्रजाति हुआ करती थी। फिर हिमयुग आया और डायनासोरों के बड़े एवं शक्तिशाली शरीरों का अत्यधिक क्षेत्रफल ही उनकी मृत्यु का कारण बन गया। उस समय जो छोटी और कमजोर प्रजातियाँ थीं वो अपने छोटे से शरीर के कारण उस भीषण ठंड में भी बच गईं। प्रकृति सबसे शक्तिशाली को नहीं चुनती, उसे चुनती है जो अपने आप को बदलते वातावरण के अनुकूल बना पाता है। ऐसा करने में ज़्यादातर छोटे और कमजोर ही सफल हो पाते हैं।"     

यह सुनते ही वो बड़ा आदमी मंदिर से ऐसे भागा जैसे उसके पीछे भूत पड़ गए हों। 

.

मौलिक एवम अप्रकाशित

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Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on July 16, 2015 at 12:05pm

बहुत बहुत शुक्रिया आदरणीय गिरिराज जी


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on July 16, 2015 at 6:16am

आदरणीय धर्मेन्द्र भाई , आपकी गज़ल की तरह आपकी कथा का विषय भी निराला है , बहुत सुन्दर । वैज्ञानिक कसौटी पर भी खरी रचना । हार्दिक बधाई आपको ।

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on July 15, 2015 at 11:08pm

 बहुत बहुत शुक्रिया आदरणीया राजेश कुमारी जी

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on July 15, 2015 at 11:07pm

बहुत बहुत शुक्रिया आदरणीय विनय कुमार जी

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on July 15, 2015 at 11:07pm

बहुत बहुत शुक्रिया आदरणीय मिथिलेश जी

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on July 15, 2015 at 11:07pm

बहुत बहुत शुक्रिया आदरणीय प्रदीप कुशवाहा जी


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on July 15, 2015 at 6:14pm

उसके संशय का निवारण ही उसकी अंतरात्मा ने कर दिया कहते हैं न आदमी सब समझता है पर समझना नहीं चाहता.प्रकर्ति के अनुरूप सब कहाँ ढाल पते हैं अपने आप को ,अच्छी लघु कथा लिखी है हार्दिक बधाई आ० धर्मेन्द्र जी 

Comment by विनय कुमार on July 14, 2015 at 6:56pm

ये प्रकृति का नियम है कि वही बचता है जो अपने आपको परिस्थितियों के अनुकूल ढाल लेता है | डार्विन के सिद्धांत को बखूबी बताती बढ़िया लघुकथा , बधाई.


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on July 14, 2015 at 1:35pm

आदरणीय बड़े भाई धर्मेन्द्र जी, बहुत बढ़िया लघुकथा हुई है. शीर्षक आकर्षक है और लघुकथा उसे सार्थक भी कर रही है. लघुकथा अपने मर्म को अभिव्यक्त करने में सफल है. पंच लाइन दमदार है. इस शानदार प्रस्तुति पर हार्दिक बधाई 

Comment by PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA on July 14, 2015 at 11:40am

प्रकृति सबसे शक्तिशाली को नहीं चुनती, उसे चुनती है जो अपने आप को बदलते वातावरण के अनुकूल बना पाता है।

बढ़िया शिक्षा 

बधाई , सादर 

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