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दलदली जमीं पर ख्वाबों की बुनियाद

दलदली जमीं पर ख्वाबों की बुनियाद

 

यामिनी हर दिन अपनी बेटी को लोरी सुनती थी ,जो आम लोरी से कुछ हट के होता था .

“मैं कम पढ़ी लिखी ,मजबूर और अकेली थी “.

तुम तन्हा नहीं ,मैं हूँ ना

“मेरे पास धन नहीं सिर्फ तन की दौलत थी “

तुम इतनी कंगाल नहीं होगी कि तुम्हे अपनी दुर्लभ तन बेचनी पड़े .

“संसार में कोई काम छोटा नहीं होता ,मैं भी हमदोनों की पेट की खातिर ही इसे काम समझ करती हूँ .”

तुम इतना सक्षम होगी कि छोटे काम तुम्हे करने ही नहीं होंगे.

“मेरी बेटी मैं इस दलदल में ख्वाबों की एक बीज बो रहीं हूँ,उम्मीदों की बुनियाद इतनी मजबूत इरादों से बनी होगी कि खवाबों का महल फौलादी होगा   “.

जाने बच्ची ने क्या समझा पर हाथ –पैर पटक चमकती आँखों से,”हूँ हूँ हाँ “ की आवाजें  यामिनी की इरादों को बुलंद कर गयीं .

(मौलिक व् अप्रकाशित )

 

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Comment by Rita Gupta on August 2, 2015 at 12:45pm

आदरणीय सौरभ जी  त्रुटियों की ओर इंगित करने  हेतु बहुत  आभार ,इस मंच पर लिखने  का यही मकसद है .मैं एडिट कर उन्हें दूर  करने की कोशिश करती हूँ .

Comment by Rita Gupta on August 2, 2015 at 12:44pm

आभार आदरणीय सुशील जी .

Comment by Rita Gupta on August 2, 2015 at 12:43pm

आदरणीय मिथिलेश जी आभार .


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on August 2, 2015 at 3:12am

टंकण त्रुटियों और व्याकरण सम्बन्धी अशुद्धियों केकारण कथा वाचन में मजा नहीं आया आदरणीया रीताजी.

प्रयास हेतु शुभकामनाएँ

 

Comment by Sushil Sarna on August 1, 2015 at 7:44pm

आदरणीया बहुत सुंदर और सार्थक लघुकथा प्रस्तुत की है आपने।  हार्दिक बधाई। 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on August 1, 2015 at 4:10pm

आदरणीया रीता जी बहुत भावपूर्ण प्रस्तुति. इस प्रस्तुति पर हार्दिक बधाई...

Comment by Rita Gupta on August 1, 2015 at 12:20pm

धन्यवाद आदरणीय Manoj जी .

Comment by मनोज अहसास on August 1, 2015 at 8:41am
बहुत सुंदर
सादर

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