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लघु कविताएँ // रवि प्रकाश

विरह
मैं तो गाढ़े अँधियारे की
पत्थर जैसी छाती पर
उँगली से नाम तुम्हारा
लिख कर सो जाता हूँ,
क्या तुम भी यूँ ही जीती हो?
॰॰
दो नैन
कितनी सीधी है नैनों की बोली!
अनपढ़ होता तो भी पढ़ लेता
हर अक्षर हमजोली!
॰॰
उदासी
ये भीनी-भीनी,नर्म उदासी
किसी ताल सी ठहरी है
कँकर मत फेंको!
॰॰
चाह
मैं चाहता हूँ-
हम साथ चलें कोसों
फिर सहसा पूछें इक-दूजे से-
"तुम थक तो नहीं गए?"
॰॰
टूटन
ये टूटन ही सीधा रखती है
मेरुदण्ड मेरा,
मैं नहीं चाहता
कि तुम दुबारा मिलो
और सब कुछ सही हो जाए।
॰॰
परिभाषा
ये परिभाषा युगों पुरानी लगती है
कि प्यार कोई आवाज़ नहीं,
अल्फ़ाज़ नहीं
एक ही सपना है
दो जोड़ी आँखों में।
-मौलिक एवं अप्रकाशित।
-18.07.2015

Views: 918

Comment

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Comment by Ravi Prakash on August 6, 2015 at 3:34pm
धन्यवाद आ॰ गोपाल नारायण जी।
Comment by Ravi Prakash on August 6, 2015 at 3:31pm
इतने सूक्ष्म विश्लेषण के लिए कोटि कोटि धन्यवाद आ॰ कांता जी।
Comment by Ravi Prakash on August 6, 2015 at 3:31pm
इतने सूक्ष्म विश्लेषण के लिए कोटि कोटि धन्यवाद आ॰ कांता जी।
Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on August 6, 2015 at 10:12am

शब्दों का प्रयोग आहलादित करता है .. 

Comment by kanta roy on August 5, 2015 at 11:28pm
शब्दों से शब्द में मर्म है । हर एक पंक्ति लाजवाब बनी है ।
मैं तो गाढ़े अँधियारे की
पत्थर जैसी छाती पर
उँगली से नाम तुम्हारा
लिख कर सो जाता हूँ,
क्या तुम भी यूँ ही जीती हो?...... वाह !!!!!! कितना कोमल भाव लिए है ये ... अति सुंदर !
Comment by Ravi Prakash on August 5, 2015 at 1:57pm
आ॰ मिथिलेश जी, स्नेह और आशीर्वाद के लिए कोटिश: धन्यवाद ।
Comment by Ravi Prakash on August 5, 2015 at 1:54pm
धन्यवाद सविता मिश्रा जी।
Comment by Ravi Prakash on August 5, 2015 at 1:52pm
धन्यवाद आ॰ सौरभ जी।

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on August 5, 2015 at 12:26pm

आदरणीय रवि प्रकाश जी, सभी क्षणिकाएं बहुत शानदार हुई है, सीधे दिल में उतरती गई. इस भावपूर्ण सशक्त प्रस्तुति पर हार्दिक बधाई निवेदित है. सादर 

Comment by savitamishra on August 5, 2015 at 12:20pm

खुबसुरत क्षणिकाए

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