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फँसाने आँखो के

फँसाने आँखो के
सूखे पड़े हए है
वक़्त के आगे
बेबस खड़े हुए है
यारों तुम भी हँस लो वरना
उन जैसे हो जाओगे
गाते हुए चेहरे जो
ख़ामोश पड़े हुए है
देर रात की सड़कों पर
धूमें तो मालूम हुआ
कुछ लोग पत्थरों पर
बिन चादर सोये हुए है
मालूम है हमें भी
हक़ीक़त उन चेहरों की
मुस्कुराकर हाथ मिलाने का
जो बोझ लिए हुए है
मौलिक व अप्रकाशित"

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Comment by S.S Dipu on August 12, 2015 at 11:27am
Laxman dhami ji thank you so much
Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on August 12, 2015 at 11:24am

आ० दीपू भाई , इस सुन्दर रचना के लिए हार्दिक बधाई .

Comment by S.S Dipu on August 11, 2015 at 3:37pm
Tanuja upreti ji thanks a lot for your appreciation IT means a lot . Thank you
Comment by Tanuja Upreti on August 11, 2015 at 3:32pm

सुन्दर रचना के लिए बधाई दीपू जी 

Comment by S.S Dipu on August 11, 2015 at 3:28pm
आ० Pratibha Pande ji शुक्रिया
Comment by pratibha pande on August 11, 2015 at 3:03pm

मुस्कुराकर  हाथ मिलाने  का जो  बोझ लिए हुए हैं,  वाह बधाई इस आज के समय का सटीक वर्णन करती रचना के लिए आ० दीपू  जी  

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