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ग़ज़ल ,,,,,,,,, गुमनाम पिथौरागढ़ी ,,,,,,,

२१२२  २१२२  २१२२  २१२

भेड़िये यूँ घूमते हैं झोपड़ी के सामने

डालते वहशी नज़र सब छोकरी के सामने

जेब खाली देखकर ये रेजगारी कह उठी

जेब खाली मत दिखाना तुम किसी के सामने

पेट बच्चा भर ना पाता बूढ़े से माँ बाप का

रोज मजमा जो लगाता घर गली के सामने

इस नशे में देखिये तो घर उजाड़े हैं बहुत

ये नशा दीवार है घर की ख़ुशी के सामने

शाम से ही सज रही मजबूर सी ये लडकियाँ

ज़ख्म ढक के आ गयीं हैं अब सभी के सामने

मिल ही जाती इक दवा तो यार मेरे गम की भी

मैं सदा से चुप ही रहा हूँ वैध जी के सामने

मौलिक व अप्रकाशित

गुमनाम पिथौरागढ़ी

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सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on September 2, 2015 at 10:31am

आदरणीय गुमनाम भाई , आपकी ये ग़ज़ल ठीक ठीक है , मै भी आदरणीय सौरभ भाई जी की बात से सहमत हूँ , शायद कुछ समय और देना था आपको । गज़ल के लिये आपको हार्दिक बधाइयाँ ।

Comment by मनोज अहसास on September 1, 2015 at 9:36pm
शाम से ही सज रही मजबूर सी ये लडकियाँ
ज़ख्म ढक के आ गयीं हैं अब सभी के सामने

ख्याल की ये ऊँचाई पूरी ग़ज़ल में निभा दीजिये
बहुत खूबसूरत गजल होगी
सादर
Comment by gumnaam pithoragarhi on September 1, 2015 at 7:08pm

नमस्कार दोस्तो अच्छा लगा कि मुझसे और बेहतर की उम्मीद की जाती ,,,,,, सौरभ जी मैं आपकी उमीदों पर खरा उतरने की कोशिश करूंगा ........... छोकरी क्या युवा होती लड़की या टीन एजर के लिए प्रयोग नही कर सकते ,,,,,,,,,,,

Comment by भुवन निस्तेज on September 1, 2015 at 10:00am

गुमनाम भाई अच्छी गजल हुई है आदरणीय सौरभ जी कि बातों क संज्ञान ललें....


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on August 31, 2015 at 11:17pm

गुमनाम भाई,  मैं आपकी कोईग़ज़ल एक अरसे बाद देख रहा हूँ. क्षमा कीजियेगा मैं स्वयं भी तनिक व्यस्त चल रहा हूँ. 

आपकी इस ग़ज़ल में बहुत कुछ है जो मुझे इस ग़ज़ल को आपकी ग़ज़ल कहने से रोक रहा है. कई भाव स्पष्ट रूप से निखर के नहीं आ पाये है.  अर्थात शेरों को और समय देना था. मतला में ’छोकरी’ शब्द का प्रयोग भी अटपटा लग रहा है.  हिन्दी में या उर्दू में किसी युवती के लिए ’छोकरी’ कोई सम्माननीय शब्द नहीं माना जाता. 

आपसे आपके लायक की प्रस्तुति की प्रतीक्षा रहेगी. 

शुभेच्छाएँ 

Comment by Sushil Sarna on August 31, 2015 at 7:58pm

भेड़िये यूँ घूमते हैं झोपड़ी के सामने
डालते वहशी नज़र सब छोकरी के सामने … गहन भावों को समेटे इस खूबसूरत ग़ज़ल के लिए हार्दिक बधाई कबूल फरमाएं सर।


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on August 31, 2015 at 2:26pm

बहुत बढ़िया ग़ज़ल हुई है आपको हार्दिक बधाई इस प्रस्तुति पर आदरणीय.

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