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नवगीत

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तुलसी के बिरवे ने तेरी 
याद दिलाई है
सर्दी नहीं लगी थी फिर भी
खांसी आई है
खड़े खड़े सब देख रहा है
मन भौंचक्के
अक्स ज़ेहन से चुरा ले गए 
ख़्वाब उचक्के 
शोर मचाती भाग रही
कोरी तनहाई है
बंद हुआ कमरे में दिन
सिटकिनी लगा के 
आदत से मज़बूर छुप गई 
रात लजा के 
चन्दा सूरज ने इनको 
आवाज़ लगाईं है
घर का कोना कोना अब तक
बिखरा बिखरा है
गलियों में भी एक अदद 
सन्नाटा पसरा है
लगता अभी अभी लौटा 
कोई दंगाई है
कितने तीर निशाने पर से 
चूक गए
अरमानों के पिंजरे सारे
टूट गए
पीर वही समझेगा जिसकी 
फटी बिवाई है
चाँद पार करने पर एक
नगर बसता है
बेशक लंबा जाने का  
उस तक रस्ता है
चलो चलें हम वहीँ अगर
ये जग बलवाई है

 

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Comment

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Comment by Rajeev Mishra on April 13, 2011 at 7:27pm
एक सुंदर रचना ................शब्दों मे इस सोच और सर्थाक्ता को बयां नहीं कार सकता

हार्दिक धन्यवाद इस पोस्ट के लिए !
Comment by Rajeev Mishra on April 13, 2011 at 7:23pm
bahut hi sunder rachna ...............shabdon mai bayan karana muskil hai jee

सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on April 13, 2011 at 12:04pm
//
तुलसी के बिरवे ने तेरी 
याद दिलाई है
सर्दी नहीं लगी थी फिर भी
खांसी आई है//
राणाभाई, बहुत खूब.. प्रथम अंतरा तो जैसे सारा कुछ कह गया.. 
तन्हाई को, भाई, आपने ’भगाया’ है..  किन्तु, मुझे तो वो शोर मचाती ’दीख’ रही है. ’भागती रहे’ या विजन में बेबस ’रुकी रहे’ उसके हिस्से का ख्वाब उचक्कों के हाथों पड़े हैं.. बहुत खूब.
फटी है भाई, फटी है.. बिवाई मेरी भी फटी है.. . तभी तो साथ मिलकर स्वर-आवृति साध रहा हूँ..  
शुभकामनाएँ.. 

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