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जलते तो है सभी

पर जलने का भी होता है

एक ढंग, एक कायदा,

एक सलीका

जब मै किसी दिए को

किसी निर्जन में

जलते देखता हूँ निर्वात   

तब समझ पात़ा हूँ

कि क्या होता है

तिल–तिल कर जलना,

टिम-टिम करना 

घुट-घुट मरना

और तब मुझे याद आती है

मुझे मेरी माँ

जीवनदायिनी माँ 

सब को संवारती

खुद को मिटाती माँ !

(अप्रकाशित व् मौलिक )

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Comment by vijay nikore on September 13, 2015 at 1:19pm

//

जब मै किसी दिए को

किसी निर्जन में

जलते देखता हूँ निर्वात   

तब समझ पात़ा हूँ

कि क्या होता है

तिल–तिल कर जलना//

उफ़ ! आपकी रचना ने झकझोर दिया । आपसे ऐसी ही अच्छी रचना की आशा रहती है। बधाई।

Comment by Sushil Sarna on September 12, 2015 at 7:53pm

तब समझ पात़ा हूँ
कि क्या होता है
तिल–तिल कर जलना,
टिम-टिम करना
घुट-घुट मरना
और तब मुझे याद आती है
मुझे मेरी माँ
जीवनदायिनी माँ
सब को संवारती
खुद को मिटाती माँ !

माँ के भाव को सजीवता से चित्रित करती इस मार्मिक प्रस्तुति पर सादर नमन आपको आदरणीय डॉ गोपाल भाई साहिब। मन द्रवित कर गयी आपकी रचना। …_/\_

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on September 11, 2015 at 8:44pm

आ० मिथिलेश जी -- मां की बातें सबको रिझाती हैं , सादर .

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on September 11, 2015 at 8:43pm

आ०समीर कबीर साहेब - गजल हो या कविता    सभी एक सुन्दर अहसास ही तो हैं --आपका शुक्रिया

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on September 11, 2015 at 8:41pm

 महनीया छाया  शुक्ल जी -- आप दो बार प्रस्तुत हुईं - मैं  आभारी हूँ .

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on September 11, 2015 at 8:40pm

आ० शिज्जू भाई - माँ का अहसास सबको  ही है , सादर .

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on September 11, 2015 at 8:38pm

आ0 श्याम नारायन  वर्मा जी - आपका आभारी हूँ.

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on September 11, 2015 at 8:37pm

आ० हर्ष महाजन  जी

आपका आभार


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on September 11, 2015 at 2:31pm

आदरणीय डॉ गोपाल नारायण श्रीवास्तव सर, शानदार और मार्मिक रचना की प्रस्तुति हुई है. आपको हार्दिक बधाई इस प्रस्तुति पर.

Comment by Samar kabeer on September 10, 2015 at 11:11pm
आली जनाब डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव जी,आदाब,वाह,बहुत ख़ूब,ज़रूरी नहीं कि शायरी ग़ज़ल में ही की जाए ,अपनी इस बात के सुबूत में मैं आपकी यह रचना रख सकता हूँ,दिल से दाद क़ुबूल कीजिये ।

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