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 ईश्वर अलक्ष्य है क्या ?

शायद –

तब तुमने माँ को नहीं जाना

न समझा न पहचाना

सचमुच

अभागा है तू

(मौलिक व् अप्रकाशित )

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Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on September 16, 2015 at 9:36pm

आ० सुनील जी

आपकी नजरो का कायल हुआ  

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on September 16, 2015 at 9:34pm

प्रिय कृष्णा  बहुत बहुत आभार

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on September 16, 2015 at 9:32pm

आ० मिथिलेश  जी -- आपकी संस्तुति  से बल  मिला .

Comment by shree suneel on September 16, 2015 at 8:29pm
थोड़ी सी पंक्तियाँ कितने विशाल भाव वहन करती हैं आदरणीय!
इस समर्थ रचना के लिए हार्दिक बधाई आपको. सादर
Comment by Krish mishra 'jaan' gorakhpuri on September 16, 2015 at 6:56pm
वाह!आ० 'गागर में सागर'.....नमन!

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on September 16, 2015 at 12:07pm

बहुत बढ़िया प्रस्तुति... हार्दिक बधाई सर 

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on September 16, 2015 at 10:17am

आ० प्रतिभा जी --आपका अनुगृहीत हूँ

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on September 16, 2015 at 10:15am

आ० नीर जी --आपका आभार

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on September 16, 2015 at 10:14am

आ० शिज्जू भाई --आपके समर्थन से संतुष्टि मिली

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on September 16, 2015 at 10:13am

आ० विजय सर -- आप्यायित हुआ ,

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