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'मुखाग्नि'- (लघु कथा)

आज सुबह उस चाय की गुमटी पर गरमा गरम चाय पीते-पीते कुछ मुखों से शब्दों के अग्नि-बाण से निकल रहे थे।
"अरे सुना तुमने, मज़हब की बंदिशें तोड़ ग़रीब दोस्त संतोष को मुस्लिम युवक रज़्ज़ाक ने कल मुखाग्नि दी !"
यह सुनकर एक पंडित जी बड़बड़ाने लगे-

"सारा अंतिम संस्कार अपवित्र हो गया, पता नहीं आत्मा को कैसे शान्ति मिलेगी ?"
इस पर एक शिक्षित युवक बोला-

"अरे ये सब वो धर्मान्तरित मुसलमान हैं जो आज भी अपने मूल धार्मिक कर्मकांड गर्व से करते हैं।"
तभी एक दाढ़ी वाले ने दाढ़ी पर हाथ फेरते हुये धीरे से कहा-

"सही कहते हैं हमारे चच्चाजान, इस्लाम संकट में है !"
एक छिछौरे ने चुटकी लेते हुए कहा-

"अरे, मुझे तो लगता है उसकी पत्नी से पहले से कोई यारी रही होगी !"
इन बातों को सुनकर चाय वाला बोला-"छोड़ो भी, रात गई, बात गई, आप तो चाय पियो। मेन बात तो समझ नईं रये, मूंह चलाये जा रये !"

मौलिक व अप्रकाशित
शेख़ शहज़ाद उस्मानी
शिवपुरी म.प्र.

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Comment by kanta roy on September 22, 2015 at 12:15am

वाह !! बहुत खूब लघुकथा हुई है आदरणीय शेख़ शहजाद उस्मानी जी।  बधाई स्वीकार करें   

Comment by Sushil Sarna on September 21, 2015 at 1:48pm

धर्म से ऊपर इंसानियत के फ़र्ज़ को चित्रित करती एक सशक्त लघु कथा   .... हार्दिक बधाई आदरणीय। 

Comment by TEJ VEER SINGH on September 21, 2015 at 11:38am

हार्दिक बधाई शेख उसमानी  जी !बेहद सशक्त और समयानुकूल प्रस्तुति!

Comment by pratibha pande on September 21, 2015 at 10:18am

वाह ,वाह , अगर मेन बात ही समझ आ जाती तो ,सुख चैन आ जाता और मुद्दे नहीं बचते ,और अगर मुद्दे ही नहीं बचते तो ............,दिल और दिमाग़ को झंकझोरती कथा बनी है  ,बधाई आपकोआदरणीय 

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