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चाँदी के बटन ( लघु कथा )

सुनार की दुकान में बैठी नीलिमा अपनी बारी की प्रतीक्षा कर रही थी।कि 75- 78 वर्ष के बुजुर्ग पर ध्यान चला गया।
" आओ -आओ आज़ क्या बनवा रहे हो अपनी बुढ़िया के लिए।" सुनार मोती लाल ने कहा।
ज़ेब से सुंदर चाँदी के बटन निकाल बुजुर्ग बोले , " इनमें चाँदी के घुंघुरू लगा दो।"
" आहा बुबू जी ! कितने सुंदर हैं ये ; कहाँ से बनवाये ? " नीलिमा ने उनको बैठने की ज़गह देते हए पूछा।

"चेली ! ये असली चाँदी नहीं है। नकली बटन हैं "
"अरे , तो फ़िर इनमें असली चाँदी के घुंघुरू क्यों लगवा रहे हैं।?"

" लम्बी कहानी है चेली ! - मेरा ब्याह 11 वर्ष की उम्र में हुआ।छुइ-मुई गुड़िया सी दुल्हन थी 9 बरस की।एक साथ खेलते,रूठते-मनाते थे। एक दिन मैँ मेले जा रहा था तो बोली " लौटते हुए मेरे लिए चाँदी के बटन ला देना ।कुरती में लगाऊंगी।पर मैं आश्रित कहाँ से लाता।"

" धीरे-धीरे समय गुज़रता रहा। घर -परिवार की ज़िम्मेदारी फ़िर बच्चों की ज़रूरतें , ज़ेब हमेशा खाली रही।"
"ओह , आज़ वो खुश हो जाएँगी?" नीलिमा ने कहा।
"हाँ , न जाने कितने दिन का और साथ है हमारा "कहते हुए उनकी आँखे सज़ल हो उठी।

"मेरे दिल में वर्षों से ये घुंघरू कसक बनकर छनक रहे थे, आज़ बाज़ार में एक कश्मीरी बेच रहा था खरीद लिए , सोचा खुश हो जायेगी।वो क्या जाने असली क्या और नकली क्या।" उसके लिए तो ये चाँदी के बटन होंगें सोचा इनमें कुछ तो असली हो ।ये कह उन्होंने भीगी आँखे फेर ली।

मौलिक एवम् अप्रकाशित

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Comment by Sheikh Shahzad Usmani on November 4, 2015 at 9:39am
बहुत ही सुंदर व नवीन कथानक के साथ कथ्य का भाव पूर्ण निर्वहन करती अनुपम कृति के लिए तहे दिल बहुत बहुत बधाई और शुभकामनाएँ आदरणीया जानकी वाही जी ।
Comment by pratibha pande on November 4, 2015 at 8:23am

मन मोह लिया आपकी कहानी ने जानकी जी , शब्द नहीं हैं तारीफ को ,हार्दिक बधाई.   बेटी को चेली तो उत्तराखंड में कहते हैं,,क्या वो ही भाव हैं ? 

Comment by Janki wahie on November 4, 2015 at 6:43am
तहे दिल से शुक्रिया प्रिय राहिला जी।
Comment by Rahila on November 3, 2015 at 8:41pm
बहुत सुन्दर रचना प्रिय जानकी दी! आंखों के सामने चलचित्र सी घूम गई। बहुत कम होंगें ऐसे लोग जो उम्र के इस पडाव पर अपने हमसफर का यूं ख्याल रखते होंगें।बहुत बधाई आपको दी।

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