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हमीद की माँ की मुस्कान ( लघु कथा )

जयेश के घर चारों मित्र सपरिवार ज़मा हैं। हँसी-ठहाके, दुःख-दर्द चाय और समोसों के साथ उड़ाये जा रहे हैं।

टीवी चैनलों पर सहिष्णुता और असहिष्णुता पर दिग्गज लोगों की बहस ज़ारी है।
धर्म, राजनीति और देश,बहस के रूप में कमरे का तापमान बढ़ानें को पर्याप्त हैं । पत्नियाँ दूसरे कोने में अपने-अपने घर -बच्चों में रमी हैं।

एकाएक चंद्रप्रकाश ने दीवार पर लगे पारिवारिक चित्र को देख कर पूछा -" जयेश ! तुम तो बहुत छोटे हो इसमें बाकि और कौन-कौन हैं ?"
"हम चार भाई ,दीदी,माँ -पिताजी और बीच में खड़ी हमीद की माँ ।"

अचानक कमरे में सन्नाटा छा गया।
" मैं समझा नहीं ,पारिवारिक चित्र में ये क्यों ?" चन्द्रप्रकाश बोला।

"अरे भाई ! तस्वीर खींचते समय ये वहाँ खड़ी थी। इसलिए उन्हें भी बुला लिया।बहुत ही नेक और अच्छी थीं।उनके हाथों की गर्म रोटियां आज़ भी याद आती हैं। पूरा मोहल्ला उनके परिवार को पसन्द करता था।

अब सब नए सिरे से तस्वीर का अवलोकन कर रहे थे। और फ़ोटो में हमीद की माँ की मुस्कान ,मोनालिसा की मुस्कान को मात दे रही थी।

मौलिक एवम् अप्रकाशित ।

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Comment by Janki wahie on November 17, 2015 at 11:37am
सादर आभार शहजाद जी और स्तविन्दरर जी।
Comment by Sheikh Shahzad Usmani on November 13, 2015 at 10:46am
सर्वधर्म समभाव के ऐसे उदाहरण ही गंगाजमुनी संस्कृति के पौधे को सतत सिंचित कर रहे हैं। बहुत अच्छे समसामयिक विषय पर सुंदर सार्थक भाव पूर्ण रचना के लिए बहुत बहुत बधाई और शुभकामनाएँ आपको आदरणीया Janki Wahie जी।
Comment by सतविन्द्र कुमार राणा on November 9, 2015 at 4:03pm
बेहद सुंदर रचना के लिए बधाई स्वीकारें आदरणीय जानकी जी
Comment by Vijay Joshi on November 9, 2015 at 2:16pm
Di kucha log mohalle har ghar ke family members se lgte hai. Shundar.rehna. badhai.
Comment by Janki wahie on November 7, 2015 at 10:58pm
आभार आ.तेज़। वीर ज़ी
Comment by Janki wahie on November 7, 2015 at 10:57pm
आभार आ.प्रतिभा जी सुंदर टिप्पणी के लिए।
Comment by Janki wahie on November 7, 2015 at 10:56pm
शुक्रिया प्रिय राहिला जी इस सुंदर टिप्पणी के लिए।
Comment by Rahila on November 7, 2015 at 8:42pm
दिल को छू गई प्रिय जानकी दी! आपकी रचना । बहुत ही खूबसूरती के साथ कथा को कसा आपने,बहुत -बहुत बधाई आपको ।
Comment by pratibha pande on November 7, 2015 at 7:52pm

बहुत सहज पर प्रभावी शिल्प के साथ बुनी कथा ,बहुत गहरे मर्म के साथ ,बधाई आपको आदरणीया जानकी जी 

Comment by TEJ VEER SINGH on November 7, 2015 at 11:06am

हार्दिक बधाई आदरणीय जानकी जी!बहुत सुंदर और समयानुकूल रचना!

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