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जैसी तुम हो मॉंं // आबिद अली मंसूरी!

तुमसे ही तो है

यह जीवन मेरा
तुम्हारी ही अमानत है
हर सांस मेरी
कर्ज़दार है
तुम्हारी ममता की
आत्मा हो तुम मेरी
तुमसे ही
संसार है मॉंं........
क्या लिखूं
मैं इससे आगे
असमर्थ हूं
एक मैं ही क्या
यह
सारा संसार भी
मॉं की ब्याख्या
नहीं कर सकता
क्योंकि मॉंं..
मॉंं होती है
जैसी, तुम हो मॉंं..!!
--------------------------------------
--------------आबिद अली मंसूरी!
(मौलिक व अप्रकाशित)

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Comment by Sheikh Shahzad Usmani on February 22, 2018 at 6:45am

बहुत कुछ कह डालने की चाहत में गागर में सागर भर डाला आपने। तहे दिल से बहुत-बहुत मुबारकबाद मुहतरम जनाब आबिद अली मंसूरी साहिब। इस भावपूर्ण रचना  को विस्तार देकर बढ़िया छंदबद्ध सृजन भी आप कर सकते हैं।

Comment by Abid ali mansoori on November 6, 2015 at 11:05pm

आदरणीय मोहन जी सच कहा आपने, सराहनीय प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक धन्यवाद!

Comment by Abid ali mansoori on November 6, 2015 at 11:03pm

आदरणीय मिथिलेश जी आभार आपका मनोवल बढ़ाने के लिए, आशा है समय-समय पर मार्गदर्शन भी करते रहेंगे आप!

Comment by Abid ali mansoori on November 6, 2015 at 11:00pm

आदरणीय विजय जी उत्साहवर्धन के लिए हार्दिक आभार आपका!

Comment by मोहन बेगोवाल on November 6, 2015 at 7:27pm

आदरणीय मंसूर जी, माँ की ममता कि क्या कहने , मगर लगता है, समय के साथ माँ के बदले हुए रूप पर बहुत कम काम हुआ है, जैसी तबदीली समाज में हो रही उस से माँ के रिश्ते में भी तबदीली देखने को मिल रही है 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on November 6, 2015 at 1:34pm

आदरणीय मंसूर जी बढ़िया प्रस्तुति हुई है हार्दिक बधाई 

Comment by Dr. Vijai Shanker on November 6, 2015 at 8:49am
सारा संसार भी
मॉं की व्याख्या
नहीं कर सकता।
रचना सराहनीय है , बधाई आदरणीय आबिद अली मंसूरी जी , सादर।
Comment by Abid ali mansoori on November 5, 2015 at 11:21pm

रचना प्रकाशन के लिए हार्दिक आभार आदरणीय सम्पादक महोदय!

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