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तुम निष्ठुर हो …

तुम निष्ठुर हो …

तुम निष्ठुर हो तुम निर्मम हो
तुम बे-देह हो तुम बे-मन हो
तुम पुष्प नहीं तुम शूल नहीं
तुम मधुबन हो या निर्जन हो
तुम निष्ठुर हो …

तुम विरह पंथ का क्रंदन हो
तुम सृष्टि भाल का चंदन हो
तुम आदि-अंत के साक्षी हो
तुम वक्र दृष्टि की कंपन्न हो
तुम निष्ठुर हो …
तुम  नीर  नहीं समीर नहीं
तुम हर्ष नहीं तुम पीर नहीं
तुम हर दृष्टि  से ओझल हो
तुम रखते कोई शरीर नहीं
तुम निष्ठुर हो …
तुम चलो तो सांसें चलती हैं
तुम रुको तो सांसें जलती हैं
आखिर समय  तुम हो कैसे
तुममे तो  सदियाँ पलती हैं
तुम निष्ठुर हो …

सुशील सरना
मौलिक एवं अप्रकाशित

Views: 758

Comment

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Comment by Sushil Sarna on November 16, 2015 at 3:29pm

आदरणीय मिथिलेश वामनकर जी रचना को आपके स्नेहिल शब्दों ने जो मान दिया है उसके लिए आपका तहे दिल से शुक्रिया। 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on November 15, 2015 at 10:13pm

बहुत सुन्दर पंक्तियाँ हुई है आदरणीय सुशील सरना सर. हार्दिक बधाई 

Comment by Sushil Sarna on November 15, 2015 at 9:24pm

आदरणीय  kalpana bhatt जी रचना पर आपकी आत्मीय प्रशंसा का हृदयतल की गहराईयों से हार्दिक आभार।

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