मैं सड़क हूँ
मुझे तैयार किया गया है
रोड रोलरों से कुचल कर.
मुझे रोज रौंदते हैं
लाखों वाहन
अक्सर....
विरोध प्रदर्शन का दंश
झेलती हूँ
अपने कलेजे पर
होता रहता हैं
पुतला दहन भी
मेरे ही सीने पर
विपरीत परिस्थितियों में
मैं ही बन जाती हूँ
आश्रय स्थल
कई कई बार तो
प्राकृतिक बुलावे का निपटान भी
हो जाता है
मेरी ही गोद में
फिर भी.....
मैं सहिष्णु हूँ
या
असहिष्णु !
यह तय करते हैं
कथित बुद्धिजीवी.
मैं सड़क हूँ
एक सच्ची प्रतिनधि
इस देश की.
(मौलिक व अप्रकाशित)
पिछला पोस्ट =>लघुकथा : शातिर
Comment
आदरणीय मिथिलेश भाई, कविता अपने मूल स्वरुप में आप तक पहुँच गयी, आपकी सराहना उत्साहवर्धक है, बहुत बहुत आभार.
सामयिक विषय पर बहुत सुन्दर प्रस्तुति दी है आपने आ० गणेश जी सहिष्णुता का बेहतरीन उदाहरण सड़क से बेहतर क्या होगा दिल से बधाई इस प्रस्तुति पर |
आदरणीय बाग़ी सर, बहुत दिनों बाद आपकी रचना प्रस्तुत हुई है. समसामयिक विषय पर शानदार और सटीक रचना हुई है. प्रतीकों में कथ्य की अभिव्यंजना जबरदस्त है. इस प्रस्तुति पर हार्दिक बधाई निवेदित है. सादर
प्रतिक्रिया हेतु आभार आदरणीय रक्ताले साहब.
आदरणीय अखिलेश भाई साहब, कविता के माध्यम से कविता को सराहने का यह अंदाज पसंद आया, बहुत बहुत आभार.
सराहना हेतु आभार आदरणीय रवि शुक्ला जी.
आदरणीया कांता जी, आपकी सराहना इस कविता को प्राप्त हुई, लेखन कर्म सार्थक हुआ, बहुत बहुत आभार.
मैं सड़क हूँ
एक सच्ची प्रतिनधि
इस देश की............सच कहा है आदरणीय बागी जी बिना शटर की दूकान और किसी के खेल का मैदान और किसी के लिए हेलीपेड भी हो जाती है यह सड़क. सुंदर रचना. बहुत-बहुत बधाई. सादर.
क्या कहना आदरणीय गणेश भाईजी, जब जरूरत हुई उसी समय आपने छक्का मारा, हृदय से बधाई। इस विषय को आगे बढ़ाते हुए एक पुछल्ला प्रेषित कर रहा हूँ ..........
दोनों बाजुओं के
हरे भरे वृक्षों से
मुझे गर्मी में राहत मिलती
राहगीरों की दुख सुख की बातें सुनती
वो भी काट दिये
अपने स्वार्थ के लिए
अब न वो ठंडी हवा न छाया
चीख कर रोने की इच्छा होती है
पर मैं चुप रहती हूँ
आदरणीय गणेश जी समसामयिक रचना हेतु बधाई स्वीकार करे ।
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