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जाने क्यों

क्या ढूँढ़ने उतरते हो
रात के अंधेरे में ओ कोहरे,
चुपचाप, इस धरती की छाती पर
फिर अक्सर थक कर सो जाते हो
पत्तियों के ठिठुरते गात पर
और सहमी, पीली पड़ गयी
तिनके की नोक पर –
गाड़ी के शीशे से
न जाने कहाँ झाँकने की कोशिश में
चिपक जाते हो तुम,
अक्सर.
सुबह की थाप तुम्हें सुनायी नहीं देती
उद्दण्ड बालक की तरह
धरती का बिस्तर पकड़कर,
मुँह फेरकर सोये रहते हो
जब तक कि फुटपाथ पर
रात भर करवटें बदलता हुआ मजदूर
अपनी कुल्हाड़ी, फावड़ा चलाना शुरू नहीं करता;
ढाबे के चौखट पर
पहली कली के खिलने की तरह
पाँच साल का “छोटू”
उठकर बैठ नहीं जाता,
जब तक सड़क किनारे
पानी भरते हुए
वह
गाड़ी के शीशे से तुम्हें हटाकर
अपना नाम लिखने की कोशिश नहीं करता –
मगर फिर भी
अक्सर,
वह सर्वशक्तिमान शिशु
हार मान ही जाता है,
और तुम
रात के अंधेरे से निकलकर
दिन के उजाले पर
नक़ाब बनकर
इठलाते रहते हो....जाने क्यों!!!!

.

(मौलिक व अप्रकाशित)            

 शरदिंदु/लखनऊ/12.12.2015

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सदस्य कार्यकारिणी
Comment by sharadindu mukerji on December 30, 2015 at 3:32am
आदरणीय डॉ गोपाल नारायन जी, आपकी प्रतिक्रिया हमेशा विद्वतापूर्ण होती है....इस दृष्टि से मैं आपकी टिप्पणी का आसरा लेकर गर्व महसूस कर सकता हूँ. मेरा साहस बढ़ाने के लिए हृदय से आभार. सादर.

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by sharadindu mukerji on December 30, 2015 at 3:22am
आदरणीय समर कबीर साहब, आप मेरी रचना पर आए और उसे अपने प्यार और अपने विचार से समृद्ध किया. मैं आपका ऋणी हूँ. सादर.

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by sharadindu mukerji on December 30, 2015 at 3:18am
श्रद्धेय विजय निकोर जी, आपसे अनुमोदन पाना मेरे लिए बहुत बड़ा पारितोषिक है. आपकी निश्छल उदारता मेरा पाथेय है. नमन.
Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on December 17, 2015 at 7:44pm

वह सर्वशक्तिमान शिशु
हार मान ही जाता है,
और तुम
रात के अंधेरे से निकलकर
दिन के उजाले पर
नक़ाब बनकर
इठलाते रहते हो....जाने क्यों!!!!---- अति सुन्दर दादा , वैचारिक सांद्रता सदैव आपकी कविता को विशेष बनाती है . बहुत बहुत बधाई

.

Comment by Samar kabeer on December 16, 2015 at 10:34pm
जनाब शरदिंदु जी ,आदाब,बहुत ही सुन्दर रचना है आपकी,अच्छी लगी,बधाई स्वीकार करें ।
Comment by vijay nikore on December 16, 2015 at 2:04pm

 // क्या ढूँढ़ने उतरते हो
रात के अंधेरे में ओ कोहरे,
चुपचाप, इस धरती की छाती पर
फिर अक्सर थक कर सो जाते हो
पत्तियों के ठिठुरते गात पर
और सहमी, पीली पड़ गयी
तिनके की नोक पर –// 

और फिर निम्न...

//और तुम
रात के अंधेरे से निकलकर
दिन के उजाले पर
नक़ाब बनकर
इठलाते रहते हो....जाने क्यों!!!!  //

इतने कोमल भाव... आनन्द आ गया आपकी रचना पढ़ कर, आदरणीय शरदिंदु जी।

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