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2122 2112
आ रहा है साल नया
जा रहा है काल बचा।
तिक्त-मीठी बात रही
है सपन का जाल रचा।
अनसुनापन बोल रहा
लेख दुर्गम भाल खचा।
कर जतन मन डोल रहा
देख अब ढाढस न बचा।
थे चले उम्मीद लिये
दे गया गत साल गचा।
नाच आये थिर न हुए
मन कहा अब न नचा।
कह रहा है साल नवल
देख मेरी शान बचा।
लाज लुटती चूक गये
मैं सकूँ इसको न पचा।
चीर जोड़ो,गर न सको
बलि चढ़ो नर न लजा।
शांत रहने दे न मुझे
रक्त से दामन न सजा।
मच रही है धूम अभी
अब चलो कुछ प्यार लुटा।
मौलिक व अप्रकाशित@मनन

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Comment by Manan Kumar singh on December 25, 2015 at 11:03am
आभार आपका लक्ष्मण जी
Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on December 25, 2015 at 7:22am

इस सुन्दर प्रस्तुति के लिए हार्दिक बधाई

Comment by Manan Kumar singh on December 24, 2015 at 9:46pm
भाई सुशिल जी,आपका आभार।
Comment by Manan Kumar singh on December 24, 2015 at 9:45pm
जनाब समर जी,शुक्रिया आपका।
Comment by Sushil Sarna on December 24, 2015 at 7:58pm

शांत रहने दे न मुझे
रक्त से दामन न सजा।
मच रही है धूम अभी
अब चलो कुछ प्यार लुटा।

वाह बहुत सुंदर भावाभिव्यक्ति आदरणीय ... हार्दिक बधाई

Comment by Samar kabeer on December 24, 2015 at 5:16pm
जनाब मनन कुमार जी आदाब,इस प्रस्तुति के लिये बधाई आपको|

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