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चिता पर हूँ लेटा, जला क्यूँ न देती---ग़ज़ल (पंकज के मानसरोवर से)

122-122-122-122

.
मैं रूठा हूँ तुमसे, मना क्यूँ न लेती।
अदाओं का जादू, चला क्यूँ न लेती।।

गज़ब का नशा है जो,तेरी नज़र में।
तो हाला ये तू, आज़मा क्यूँ न लेती।।

पता है मुझे सिर्फ़, धोखाधड़ी है।
हक़ीक़त पता तू,लगा क्यूँ न लेती।।

जो डरती है हासिल,गँवाने से ग़र तू।
तो इन आंसुओं को छिपा क्यूँ न लेती।।

सुना है तेरे जिस्म में दामिनी है।
चिता पर हूँ लेटा,जला क्यूँ न देती।।

मौलिक एवम् अप्रकाशित

Views: 564

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Comment by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on January 1, 2016 at 10:29pm
आदरणीय राहुल डांगी जी सादर धन्यवाद
Comment by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on January 1, 2016 at 10:28pm
आदरणीय समर कबीर सर धन्यवाद स्वीकार करें
Comment by Rahul Dangi Panchal on January 1, 2016 at 10:09pm
आदरणीय अच्छी गजल के लिए बधाई
Comment by Samar kabeer on January 1, 2016 at 5:11pm
जनाब पंकज कुमार जी आदाब,अच्छी ग़ज़ल है भाई बधाई स्वीकार करें |
Comment by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on January 1, 2016 at 1:57pm
आदरणीय श्याम नारायण जी सादर धन्यवाद
Comment by Shyam Narain Verma on January 1, 2016 at 11:34am
बहुत खूब , पूरी ग़ज़ल बहुत उम्दा है , बहुत बहुत बधाई, सादर ,
Comment by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on December 31, 2015 at 10:54pm
आदरणीय गुमनाम जी सादर धन्यवाद
Comment by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on December 31, 2015 at 10:53pm
आदरणीय जयनीत भाई सादर आभार
Comment by जयनित कुमार मेहता on December 31, 2015 at 8:50pm
बहुत सुन्दर ग़ज़ल है,आदरणीय पंकज मिश्र जी।।
Comment by gumnaam pithoragarhi on December 31, 2015 at 7:25pm

अच्छा है भाई जी ...........................

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