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एक तरही गज़ल '' समन्दर पर उठाओगे बताओ उँगलियाँ कबतक " - गिरिराज भंडारी

१२२२ १२२२ १२२२ १२२२
बहर - हज़ज़ मुसमन सालिम
न पूछोगे, सतायेंगी तुम्हें रुसवाइयाँ कब तक

अगर तुम जान लो पीछे चली परछाइयाँ कब तक  

 

हैं उनकी कोशिशें तहज़ीब को बेशर्मियाँ बाटें  

मुझे है फ़िक्र झेलेंगे अभी बेशर्मियाँ कब तक

 

ज़रा सा गौर फरमायें कसाफत है ये नदियों की   ( कसाफत - गंदगी )

“समन्दर पर उठाओगे बताओ उँगलियाँ कब तक ”

 

शराफत की कबा कब तक बताओ बुजदिली ओढ़े

सहन करता रहेगा मुल्क ये शैतानियाँ कब तक

 

वो देखो हो रहा है अब उफ़क का रंग सिंदूरी

न सोचो तुम रुलायेंगी अभी तारीकियाँ कब तक

 

किसी की याद ख़्वाबों में ख़यालों में जो हो ज़िंदा

तो फिर सोचो सतायेंगी उसे तनहाइयाँ कब तक

 

जो नादानी में हैवानों से भी आगे रहे, उनकी ,

मैं आईने से पूछूँगा , सहें नादानियाँ कब तक

 

रसाई चीख़ की भी है नहीं जब आसमानों तक

यक़ीं वालों करोगे सोच लो ,शरगोशियाँ कब तक   
*******************************************
मौलिक एवँ अप्रकाशित

 

 

 

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सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on January 20, 2016 at 3:40pm

आदरणीया सीमा शर्मा जी , हौसला अफज़ाई का तहे दिल से शुक्रिया ।


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on January 20, 2016 at 3:39pm

आदरणीय मिथिलेश भाई , सुखन नवाज़ी और हौसला अफज़ाई का तहे दिल से शुक्रिया ।

Comment by सीमा शर्मा मेरठी on January 20, 2016 at 1:57pm
बधाई खूबसुरत गजल वाह
Comment by सीमा शर्मा मेरठी on January 20, 2016 at 1:56pm
वाह वाह खूबसूरत ग़ज़ल बधाई जी

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on January 20, 2016 at 12:00am

आदरणीय गिरिराज सर, शानदार ग़ज़ल हुई है. अशआर एक से बढ़कर एक है. इस शानदार ग़ज़ल पर हार्दिक बधाई. सादर 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on January 19, 2016 at 8:28am

आदरनीय लक्ष्मण भाई , हौसला अफज़ाई का तहे दिल से शुक्रिया ।


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on January 19, 2016 at 8:27am

आदरणीया राजेश जी , आपकी सराहना ग़ज़ल को मिली तो गज़ल कहना सार्थक हुआ । उत्साह वर्धन एक लिये आपका हार्दिक आभार ।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on January 19, 2016 at 6:09am

इस लाजवाब ग़ज़ल के लिए कोटि कोटि बधाई आ० भाई गिरिराज जी l


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on January 18, 2016 at 9:49pm

वाह  वाह  आ० गिरिराज जी ,क्या मुरस्सा ग़ज़ल कही है सभी शेर काबिले तारीफ हैं दिल से दाद हाजिर है |


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on January 18, 2016 at 8:43pm

आदरनीय सुशील सरना भाई , गज़ल की उन्मुक्त सराहना के लिये आपका तहे दिल से शुक्रिया ।

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