For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

जिन्न(लघुकथा )राहिला

गृहस्थी का काम मिनट -मिनट को पकड़ कर पूरा किये जा रही थी । सारा दिन चकरघिन्नी बनने के बावजूद किसी ना किसी के कोप का भाजन बन ही जाती । मुझे समझ नहीं आता आखिर किस ने ये दुनियादारी के नियम बनाये और किस ने सारे काम का बंटवारा इतने अन्यायपूर्ण ढंग से किया।हाथ पर हाथ धरे सुविधाओं का रसपान करने वाले घर के लगभग सभी सदस्यों के पास "आका "वरदान था और मैं? मैं किसी घटिया सी कहानी के उस जिन्न की तरह थी जो अपने आका के हुकुम पूरा करने में लगा रहता।मैं अकेली थी, तो बहुत दुःखी थी लेकिन तब तक, जब तक कि मैंने जिन्न होने वाली बात छुपा कर रखी थी।लेकिन आज अचानक मेरे मुंह से ये राज खुल गया । और फिर मेरे जैसी ढेर सारे जिन्न मेरी सखियां बन गये ।
मौलिक एवं अप्रकाशित

Views: 857

Comment

You need to be a member of Open Books Online to add comments!

Join Open Books Online

Comment by Rahila on February 24, 2016 at 11:24am
बहुत शुक्रिया आदरणीय सर जी! मैं आगे से ध्यान रखूगीं । आपने इस विधा की बेहद महत्त्वपूर्ण जानकारी दी है । इसके लिये सादर आभार ।

प्रधान संपादक
Comment by योगराज प्रभाकर on February 24, 2016 at 10:54am

भाव बेशक अच्छे हैं, लेकिन शिल्प और कहन के हिसाब से यह लघुकथा बहुत कमज़ोर है राहिला जीI लघुकथा में स्व-संवाद शैली कोई बेहतर शैली नहीं मानी जातीI उम्मीद है कि आप नज्र-ए-सानी फरमायेंगीI  

Comment by Rahila on February 23, 2016 at 10:23am
बहुत -बहुत आभार आपका आदरणीया कांता दी!जितनी सुन्दर आपकी टिप्पणी ,उतनी ही सुखद आपकी उपस्थित । सादर नमन
Comment by kanta roy on February 23, 2016 at 9:22am
बहुत सारी जिन्न ! और वे सखियाँ ! ओह , यह तो बहुत गहरी बात कर दी आपने । सुना है जिन्न के दिन भी फिरने वाले है । चलिए उस दिन का जरा इंतजार करते है । बेहतरीन लघुकथा आदरणीया राहिला जी । बधाई कबूल फरमाईयेगा ।
Comment by Rahila on February 22, 2016 at 3:42pm
इतनी गहनता के साथ अवलोकन!!मैंने नहीं सोचा था कि आप मेरी रचनाओं के शीर्षक को इतनी गंभीरता के साथ लेगें।इस तारीफ़ के लिये तहेदिल से शुक्रिया । हां आप जिस लाइन के बारे में कह रहे है वाकई बहुत बार पढ़ा और बदला फिर फाइनल कर पाई थी उसे । मैं आपकी प्रतिक्रिया का ही इंतेजार कर रही थी आदरणीय सुनील जी! बहुत आभार आपका जो आपने रचना की तारीफ़ कर मान बढ़ाया ।सादर
Comment by Rahila on February 22, 2016 at 1:38pm
आदरणीय प्रतिभा दी! इस कदर हौसला अफज़ाई पा कर दिल झूम उठा । और वहीं बहुत ज्यादा जिम्मेदारी का भी एहसास बड़ गया । कोशिश करूंगी आप सब की उम्मीदों पर खरी उतर पाऊं । सादर
Comment by pratibha pande on February 22, 2016 at 1:25pm

  पहले जिन्न सिर्फ घर में ही मुस्तैद रहता था ,पर आज तो बाहर भी रहना पड़ता है ,और दोनों जगह मुस्तैदी की दरकार हर दिन बढती ही जाती है,   राहिला जी ,आप हर दिन लघुकथा  विधा में नई ऊँचाइयाँ छू रही है ,ढेरों बधाई व् शुभकामनाएँ 

Comment by Rahila on February 21, 2016 at 3:57pm
बहुत आभार आदरणीया नीता दी! यकीनन गृहस्थी में ढेरों अंधे काम होते है जिन्हें करते-करते एक हाउसवाईफ को सांस लेने की फुर्सत नहीं मिलती। लेकिन फिर भी ’सारा दिन तुम्हें काम ही क्या है’जैसे जुमले अक्सर आहत कर जाते है । आपने रचना के मर्म को समझा ,बहुत शुक्रिया ।सादर
Comment by Rahila on February 21, 2016 at 3:51pm
आदरणीय समर कबीर सर जी! आपको रचना पसंद आई मेरा तो लिखना ही सार्थक हो गया ।बहुत आभार ।सादर नमन।
Comment by Nita Kasar on February 21, 2016 at 3:19pm
यंत्रवत मशीन की तरह वह घर संभाले तब भी उसे हाउसवाइफ का तमग़ा मिलता है अपने ही संवेदनहीन हो सकते है।क्योंकि उनके लिये जिन्न मौजूद है।बिल्कुल अलग ही परिप्रेक्ष्य में लिखी कथा के लिये बधाई आद० राहिला जी ।

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity

Manjeet kaur replied to Admin's discussion अति आवश्यक सूचना : कृपया अवश्य अवगत हों .....
"ओ बी ओ मंच से बहुत कुछ सीखने को मिला इसके बंद होने की खबर दुखद और पीड़ादाई लगी। अजय गुप्ता जी की…"
19 hours ago
Manjeet kaur commented on धर्मेन्द्र कुमार सिंह's blog post रहना हो भारत में जिंदा, चुप रहिए (ग़ज़ल)
"धर्मेंद्र कुमार जी आज के मुश्किल दौर में इतना जिगरा ! यथार्थ और सटीक वर्णन के लिए बहुत बहुत बधाई"
19 hours ago
Sushil Sarna posted a blog post

दोहा सप्तक. . . .मंच

दोहा सप्तक. . . . . मंचअभिनय करते मंच पर, माटी के किरदार ।जीवन की अनुभूतियाँ, करते वो साकार ।।यह जग…See More
21 hours ago
धर्मेन्द्र कुमार सिंह posted a blog post

रहना हो भारत में जिंदा, चुप रहिए (ग़ज़ल)

बह्र: 22 22 22 22 22 2 रहना हो भारत में जिंदा, चुप रहिएजंगल का कानून है पहला, चुप रहिएमँहगाई से…See More
yesterday
रोहित डोबरियाल "मल्हार" posted a blog post

दास्तां

एक हो दास्तां तो सुनाएं,लंबी है कहानी, फिर कभी।मिले थे जिस जगह इक उम्र पहले,वो धुंधली सी निशानी,…See More
yesterday
Awanish Dhar Dvivedi posted a blog post

समय

समय को दोष देना क्यूँ समय जीना सिखाता है समय की गति सुनिश्चित है समय ही तो विधाता है।। समय का खेल…See More
yesterday
धर्मेन्द्र कुमार सिंह commented on धर्मेन्द्र कुमार सिंह's blog post देश की बदक़िस्मती थी चार व्यापारी मिले (ग़ज़ल)
"बहुत बहुत शुक्रिया आदरणीय सौरभ जी"
yesterday
आशीष यादव replied to Admin's discussion अति आवश्यक सूचना : कृपया अवश्य अवगत हों .....
"उम्मीद है कि इस पटल से संबंधित कोई अच्छी खबर आएगी।"
yesterday

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on धर्मेन्द्र कुमार सिंह's blog post देश की बदक़िस्मती थी चार व्यापारी मिले (ग़ज़ल)
"इस सुंदर बुनावट और कहन पर आज नजर पड़ी, आदरणीय धर्मेन्द्र जी.  हार्दिक बधाई   "
May 25
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' shared their blog post on Facebook
May 24
धर्मेन्द्र कुमार सिंह commented on धर्मेन्द्र कुमार सिंह's blog post देश की बदक़िस्मती थी चार व्यापारी मिले (ग़ज़ल)
"बहुत बहुत शुक्रिया आदरणीय Ravi Shukla जी"
May 24
धर्मेन्द्र कुमार सिंह commented on धर्मेन्द्र कुमार सिंह's blog post देवता चिल्लाने लगे हैं (कविता)
"बहुत बहुत शुक्रिया आदरणीय Ashok Kumar Raktale जी"
May 24

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service