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2212 2212 2
मेरी गजल कहती बहुत है
यह घाव भी करती बहुत है।1

मन का कहा करती अकड़कर
चुप भी कभी रहती बहुत है।2

घिरकर रदीफों से भले ही
यह काफिये रचती बहुत है।3

चलती पगों को यह सहेजे
बेजा भले बचती बहुत है।4

गम को बसा अपनी लहर में
बनकर नदी बहती बहुत है।5

कितने चलाते तीर शाइर
बिंधती मगर सजती बहुत है।6

आँसू छिपाकर के बहाती
हर रूक्न में रहती बहुत है।7

कितने उड़ा लेती सपन यह
अशआर भी कहती बहुत है।8

रहती जली मल्लिका 'मनन' से
हर तंज यह कसती बहुत है।9
मौलिक व अप्रकाशित@मनन

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Comment

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Comment by Manan Kumar singh on February 23, 2016 at 2:17pm
राहिला जी आभार आपका,मैं भी गजल का विद्यार्थी ही हूँ।
Comment by Manan Kumar singh on February 23, 2016 at 2:16pm
आभार धामीजी
Comment by Rahila on February 23, 2016 at 11:50am
बहुत बेहतरीन, हांलाकि मैं इस विधा की जानकार नहीं हूं लेकिन एक साधारण पाठक के तौर पर मुझे शानदार ग़ज़ल लगी । बहुत बधाई ।सादर
Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on February 23, 2016 at 11:38am

बहुत सुन्दर ग़ज़ल हुई है l हार्दिक बधाई l

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