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212 1222 212
बरसों बाद भी देखो, इक जगह पड़े हो तुम
संग की तरह बेहिस, सख़्त हो गये हो तुम

जन्म तो लिया था पर, गाह जी नहीं पाये
अपनी लाश का कब से, बोझ ढो रहे हो तुम

ऐसे छटपटाओ मत, और डूब जाओगे
दलदली जगह है ये जिस जगह खड़े हो तुम

बेकराँ समंदर है, और लहरें तूफ़ानी
थोड़ी देर ठहरो तो, ज़िद पे क्यों अड़े हो तुम

हर बयान पर मेरा, इख़्तिलाफ़ करते हो
दिल में अपने क्या-क्या भ्रम, पाल के रखे हो तुम

शहर की हवाओं के, हर मिजाज़ को समझो
जाने कब बदल जाये, शहर में नये हो तुम

बेसबब ख़यालों की, गर्दिशों से निकलो अब
अजनबी सवालों से, आजकल घिरे हो तुम

मौलिक व अप्रकाशित

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सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on March 3, 2016 at 7:25pm

वाह वाह बहुत सुन्दर ग़ज़ल 

शहर की हवाओं के, हर मिजाज़ को समझो
जाने कब बदल जाये, शहर में नये हो तुम-----वाह्ह्ह 

दिल से दाद स्वीकारें ऊपर अरकान सही कर लें 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on March 1, 2016 at 9:58pm

आदरणीय शिज्जु भाई , बेहतरीन गज़ल के लिये दिली बधाइयाँ ।

Comment by Samar kabeer on March 1, 2016 at 5:54pm
जनाब शिज्जु शकूर जी आदाब,बहुत ही खूबसूरत ग़ज़ल से नवाज़ा है आपने मंच को,शैर दर शैर दाद के साथ मुबारकबाद क़ुबूल फरमाएँ ।
पांचवें शैर के ऊला मिसरे में"मेरा"को "मेरे"कर लें ।
Comment by Ravi Shukla on March 1, 2016 at 5:42pm
आदरणीय शिज्‍जू जी आदाब बहुत ही बढि़या ग़ज़ल कही है आपने शेर दर शेर दिली बधाई कुबूल करे
शहर की हवाओं के, हर मिजाज़ को समझो
जाने कब बदल जाये, शहर में नये हो तुम वाह वाह बहुत खूब । सादर

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