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हुनर की बात है सबको गमों में यूँ हँसाना तो नहीं आता
सभी के हाथ यारो ये मुहब्बत का खजाना तो नहीं आता

है हसरत तो  हमारी भी  लगाएँ दिल  हसीनों से जमाने में
हमें पर नाज कमसिन का जरा भी यों उठाना तो नहीं आता

हमेशा  लौट आता कारवाँ गर्दिश  का जैसे दोस्तों फिर फिर
कि वैसे लौटकर फिर  से  बुलंदी का जमाना तो नहीं आता

लगेगी जिंदगी कैसे  सजा से हट   किसी ईनाम के जैसी
सभी को यार होठों पर तबस्सुम को सजाना तो नहीं आता

चले हैं छोड़ घर अपना कटेगी अब तो बस खानाबदोशी में
निकलती है नदी जब राह में फिर से मुहाना तो नहीं आता

किया करता है वादे तो बहुत सबसे ‘मुसाफिर’ वो तहे दिल से
निभाना चाहता  भी  है मगर  उसको निभाना  तो नहीं आता

मौलिक व अप्रकाशित
लक्ष्मण धामी ‘मुसाफिर’

Views: 730

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Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on March 10, 2016 at 11:08am

आ० भाई सतविंद्र जी आभार l

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on March 10, 2016 at 11:07am

आ० भाई जय नित जी ग़ज़ल की प्रशंसा के लिए धन्यवाद l

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on March 10, 2016 at 11:06am

आ० भाई राहुल जी धन्यवाद l

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on March 10, 2016 at 11:06am

आ० अमिता जी धन्यवाद l

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on March 10, 2016 at 11:05am

आ० भाई मिथिलेश जी आभार l

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on March 10, 2016 at 11:05am

आ० भाई मोहित जी , हार्दिक आभार l

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on March 10, 2016 at 11:04am

आ० भाई समर कबीर जी उपस्थिति और प्रशंसा के लिए हार्दिक धन्यवाद l

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on March 10, 2016 at 11:03am

आ० भाई तेजवीर जी ग़ज़ल की प्रशंसा के लिए आभार l

Comment by सतविन्द्र कुमार राणा on March 7, 2016 at 11:21pm
बहुत बढ़िया।बधाई आदरणीय धामी जी
Comment by जयनित कुमार मेहता on March 7, 2016 at 10:34pm
वाह! बहुत बड़ी बह्र में बहुत खूबसूरत ग़ज़ल।।

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