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"ये मिठाई कहाँ से आई जी ?" अपने खेत के किनारे चारपाई पर चुपचाप लेटे शून्य को निहारते हुए पति से पूछाI
"अरी, वो गुलाबो का लड़का दे गया था दोपहर को।" उसने चारपाई से उठते हुए उत्तर दियाI
"कौन? वही जो शहर में सब्ज़ी का ठेला लगाता है?"
"हाँ वही! बता रहा था कि अब उसने दुकान खोल ली है, उसकी ख़ुशी में मिठाई बाँट रहा थाI" पति ने मिठाई का डिब्बा उसकी तरफ सरकाते हुए कहाI
"चलो अच्छा हुआI" पत्नी ने चेहरे पर कृत्रिम सी मुस्कुराहट आईI
"वो बता रहा था कि उसने बेटे को भी टैम्पो डलवा दिया है, और बेटी को भी कॉलेज में भर्ती करवा दिया है।"
"अच्छा?"
"हाँ! काफी तरक्की कर गया ये लौंडा शहर जाकरI"
बेमौसम बरसात से उजड़े हुए खेत को निहार, पहाड़ जैसे क़र्ज़ और घर में बैठी दो दो कुँवारी बेटियों को याद करते हुए एक ठण्डी आह भरते हुए वह बोली :
"हमसे तो वो ही अच्छा है जी ।"

.

(मौलिक और अप्रकाशित)

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Comment by Rahila on March 7, 2016 at 7:40pm
किसानों के दर्द को मैं भी बहुत करीब से देख रही हूं और आपकी रचना पढ़कर लगा रचना में उनकी तकलीफ को आपने बखूबी समेट लिया । बहुत बधाई आदरणीय सर जी! सादर
Comment by Manan Kumar singh on March 7, 2016 at 6:29pm
बदहाल किसानी का पूरा ब्योरा समाहित हो गया हो जैसे इस कहानी में।बहुत बधाई आदरणीय योगराज जी।

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