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ये कैसा शरारा है.

दरिया में ही ख़ाक हुए, ये कैसा शरारा है.
साहिल पे ही डूब गए, ये कैसा किनारा है.
यहाँ छांव जलाती है,मुस्कान रुलाती है.
रातों में खुद को खुद की ही, परछाईं डराती है .
ये कौन सी दुनिया है, ये कैसा नज़ारा है.
साहिल पे ही डूब गए, ये कैसा किनारा है.
बीच भंवर में अटक गए, मंजिल से हम भटक गए.
वक़्त ने ऐसा पत्थर फेंका, सारे सपने चटक गए.
मापतपुरी को अब बस, मालिक का सहारा है.
साहिल पे ही डूब गए, ये कैसा किनारा है
गीतकार- सतीश मापतपुरी
मोबाइल- 9334414611

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मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on June 20, 2010 at 11:34am
बीच भंवर में अटक गए, मंजिल से हम भटक गए.
वक़्त ने ऐसा पत्थर फेंका, सारे सपने चटक गए.

Bahut badhiya likhey hai satish bhaiya, jabardast soch aur behtarit abhivyakti, jai hoooooooo
Comment by Pallav Pancholi on June 18, 2010 at 11:41pm
सुंदर रचना बधाई स्वीकार करें

सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Rana Pratap Singh on June 18, 2010 at 6:05pm
यहाँ छांव जलाती है,मुस्कान रुलाती है.
रातों में खुद को खुद की ही, परछाईं डराती है .
ये कौन सी दुनिया है, ये कैसा नज़ारा है.
साहिल पे ही डूब गए, ये कैसा किनारा है.

सब इसी की तलाश में है की इस दुनिया के राज़ जान जाये.....बहुत खूब. बहुत सुन्दर..
Comment by Admin on June 18, 2010 at 3:11pm
वक़्त ने ऐसा पत्थर फेंका, सारे सपने चटक गए.
मापतपुरी को अब बस, मालिक का सहारा है.
साहिल पे ही डूब गए, ये कैसा किनारा है,

बहुत सुंदर प्रयास है , मापतपुरी भैया ,ये दुनिया तो केवल भुलावा ही है, असली शक्ति तो मालिक ही है, सबकी डोर उन्ही के हाथो मे है, और हमलोग उन्ही के अनुसार ही एक्ट करते है, बहुत बढ़िया अभिव्यक्ति,
Comment by दुष्यंत सेवक on June 18, 2010 at 1:40pm
muskan labon pe laati hai, rachna apki bahut suhati hai
aage bhi padhenge achchi rachna apki, ye vishvas hamara hai
:)
bahut badhiya mapatpuri ji

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