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जाने क्यों तेरी याद आती.

अम्बर के वातायन से जब चाँद झांकता है भू पर, .
जाने दिल में क्यों हूक उठती - जाने क्यों तेरी याद आती.
स्वप्न संग कोमल शैय्या पर जब सारी दुनिया सोती.
किसी आम्र की सुघर शाख से कोकिल जब रसगान छेड़ती.
पागल पवन गवाक्ष- राह से ज्योंही आकर सहलाता,
तेरे सहलाए अंगों में जाने क्यों टीस उभर आती.
जाने दिल में क्यों हूक उठती- जाने क्यों तेरी याद आती.
बीते हुए पल का बिम्ब देख रजनी की गहरी आँखों में.
एक दर्द भयानक उठता है दिल पर बने हुए घावों में.
घावों से यादों का मवाद जब बहकर बसन भिंगोता है,
तब सारा बदन सिहर उठता जाने क्यों साँसें थम जाती.
जाने दिल में क्यों हूक उठती - जाने क्यों तेरी याद आती.
खुद से बढ़कर तुमको चाहा प्राणों से बढ़कर प्यार किया.
तेरी नज़रों में शायद यह मैनें अक्षम्य अपराध किया.
गलत मोड़ पर कौन मुड़ा पुरी जब सोचा करता है.
निर्णय लेने से पहले ही जाने क्यों आँखें भर आती.
जाने दिल में क्यों हूक उठती - जाने क्यों तेरी याद आती.
गीतकार- सतीश मापतपुरी
मोबाइल - 9334414611

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प्रधान संपादक
Comment by योगराज प्रभाकर on June 19, 2010 at 4:51pm
//स्वप्न संग कोमल शैय्या पर जब सारी दुनिया सोती.
किसी आम्र की सुघर शाख से कोकिल जब रसगान छेड़ती//
एक बार पुन: आपने बेहतरीन प्रस्तुति दी है , .धन्यवाद स्वीकार करे ,
Comment by दुष्यंत सेवक on June 16, 2010 at 12:13pm
अम्बर के वातायन से जब चाँद झांकता है भू पर, .
जाने दिल में क्यों हूक उठती - जाने क्यों तेरी याद आती.
स्वप्न संग कोमल शैय्या पर जब सारी दुनिया सोती.
किसी आम्र की सुघर शाख से कोकिल जब रसगान छेड़ती

कभी जब सावन मे रिमझिम वो काली बदली छाएगी, कभी जब आम के पेड़ों पर कोयल गुनगुनाएगी, यक़ीनन उस घड़ी तुमको मेरी ही याद आएगी.....आपके इसी मतले पर कुछ मैने भी कभी ऐसा लिखा था.
बहरहाल इस हुक ने वाकई मे दिल की गहराइयों को छू लिया है....धन्यवाद इस बेहतरीन प्रस्तुति के लिए
Comment by Admin on June 16, 2010 at 8:15am
बहुत बढ़िया मापतपुरी जी , एक बार पुन: आपने अच्छी रचना दी है , बधाई स्वीकार करे ,

सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Rana Pratap Singh on June 14, 2010 at 10:11pm
bahut sundar!!!! kai gajah apne sundar upmayen bhi di hai... hats off!!!..........sundar likhne ke liye badhai.

मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on June 14, 2010 at 9:07pm
खुद से बढ़कर तुमको चाहा प्राणों से बढ़कर प्यार किया.
तेरी नज़रों में शायद यह मैनें अक्षम्य अपराध किया.


वाह सतीश भईया वाह, ईतना दर्द,
कहा छुपाये बैठे थे,
ये दर्द की गहरी सागर को,
हवा न लगने दिया किसी को,
समेटे रहे गम के बादल को,

bahut bahut badhai ees rachna key liyey, Dhanyabad swikar karey sriman,
Comment by Kanchan Pandey on June 14, 2010 at 8:45pm
Pahley ki tarah hi ek baar phir achhi rachna hai, mapatpuri jee ko badhai,

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