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गीत-ये प्रथम मिलन की रात

ये प्रथम मिलन की रात प्रिये!
तुम भूल न जाना।
तन-यौवन-रूप सजाया ज्यों,
घर-बार सजाना।।
ये प्रथम मिलन की रात प्रिये!
तुम भूल न जाना।

सुख-दुख में तुम सहभागी अब,
ये मन तुम पर अनुरागी अब।
तुमसे कुछ नही छिपाना है,
हिय का सब हाल बताना है।।
निश्छल मन में, निश्छल मन से,
अब तुम बस जाना।
ये प्रथम मिलन की रात प्रिये!
तुम भूल न जाना।।

पतझड़-सा सूना जीवन था,
नीरस मेरा घर आँगन था।
अब तुम जीवन में आई हो,
सतरंगी सपने लाई हो।।
इस सूनी जीवन-बगिया मे,
नव पुष्प खिलाना।
ये प्रथम मिलन की रात प्रिये!
तुम भूल न जाना।।

जब भी उदास हो जाऊँ मैं,
संघर्षों से घबराऊँ मैं।
सन्निकट चली तब आना तुम,
साहस सम्बल बन जाना तुम।।
मधुरिम व्यवहार सदा रख के,
मुझ को समझाना।
ये प्रथम मिलन की रात प्रिये!
तुम भूल न जाना।।

घर में खुशियों का वास रहे,
तुम पर सबका विश्वास रहे।
निज स्नेह-सुमन बिखराना तुम,
घर-आंगन को महकाना तुम।।
घर के अँधियारे कोनों में,
तुम दीप जलाना।
ये प्रथम मिलन की रात प्रिये!
तुम भूल न जाना।।

सुख-दुख जीवन में आते हैं,
दो दिन रहते, फिर जाते हैं।
लेकिन तुम साथ खड़ी रहना,
हर कदम साथ मेरे चलना।।
परिणय के सात वचन सजनी!
तुम सदा निभाना।
ये प्रथम मिलन की रात प्रिये!
तुम भूल न जाना।।

-रामबली गुप्ता
मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment by KALPANA BHATT ('रौनक़') on May 20, 2016 at 11:08pm

बहुत सुंदर रचना है आदरणीय | बधाई स्वीकारें | 

Comment by रामबली गुप्ता on May 14, 2016 at 11:33pm
आदरेया मीना पाठक जी बहुत बहुत आभार
Comment by Meena Pathak on May 14, 2016 at 10:40pm

बहुत सुन्दर रचना ..बधाई 

Comment by रामबली गुप्ता on April 28, 2016 at 7:20pm
रचना पर प्रतिक्रिया एवं प्रोत्साहन के लिए हृदयतल से आभार आद.विजय निकोरे जी,आद.अमित भाई साहब, एवं आद.बृजेश कुमार जी
Comment by vijay nikore on April 26, 2016 at 1:23pm

बहुत ही खूबसूरत अभिव्यक्ति। आनन्द आ गया

Comment by Amit Tripathi Azaad on April 19, 2016 at 6:06pm

रामबली जी शानदार रचना के लिए बधाई स्वीकारें 

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on April 5, 2016 at 10:41pm
 खूबसूरत रचना 
Comment by रामबली गुप्ता on March 29, 2016 at 12:36pm
सादर आभार आदरेया कांता जी
Comment by kanta roy on March 29, 2016 at 11:57am

  आपकी  रचनाओं  में  सृजन - साधना अपनी  पराकाष्ठा  में  होती  है  . सम्प्रेषण में  अनुशासन और  एक  तान  सी  अनुभूति  होती  है  . प्रस्तुत   रचनाओं  को  पढ़ना  अर्थात  स्वयं  को  समृद्ध  करना  ही  है  आदरणीय  रामबली जी . अभिनन्दन  आपको  

Comment by रामबली गुप्ता on March 26, 2016 at 11:59am
आ. मोहित जी एवं आ.रवि सर गीत पसंद करने के लिए हार्दिक आभार

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