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रामबली गुप्ता's Blog (72)

कर्मवीर

आधार छंद-मनहरण घनाक्षरी



सुख हो या दुख चाहें रहते सहज और, जग की कठिनता से जो न घबराते हैं।

स्थिति हो विषम भी तो घरें धीर निज हिय , राह अपने लिए जो स्वयँ ही बनाते हैं।।

रण ही है जीवन का नाम दूजा मान कर, कार्य में निरत पग पीछे न हटाते हैं।

जग में मनुज वे ही सदा ही सभी के लिए, कर्मवीरता के प्रतिमान बन जाते हैं।।1।।



रहें नहीं भाग्य के भरोसे पछताएँ नहीं, पथ की विषमताओं को जो पहचाने हैं।

हों नहीं निराश न ही कोशिशों से मुख मोड़ें, किसी हार से जो कभी हार नहीं…

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Added by रामबली गुप्ता on January 30, 2026 at 1:05pm — 1 Comment

कुंडलिया छंद

सामाजिक संदर्भ हों, कुछ हों लोकाचार।

लेखन को इनके बिना, मिले नहीं आधार।।

मिले नहीं आधार, सत्य के बिन उद्घाटन।

शिक्षा, संस्कृति, अर्थ, मूल्य पर भी हो चिंतन।।

बिना ज्ञान-विज्ञान, न वर्णन है प्रासंगिक।

विषय सृजन की रहें, विषमताएँ सामाजिक।।1।।

सुनिए सबकी बात पर, रहे सहज अभिव्यक्ति।

तथ्यपरक हो दृष्टि भी, करें न अंधी भक्ति।।

करें न अंधी भक्ति, इसी में है अपना हित।

निर्णय का अधिकार, स्वयं सँग रखें सुरक्षित।।

कुछ करने के पूर्व, उचित को हिय…

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Added by रामबली गुप्ता on November 4, 2024 at 8:00pm — 9 Comments

पिया का पत्र

आज खुशी से झूमूँ सखि री पत्र पिया का आया है

भाव भरे अक्षर-अक्षर ने ये तन-मन हर्षाया है

लिखते, प्रिये! तुम्हीं से सब कुछ, सुख-दुख की सहभागी तुम

तुमने इस जीवन में खुशियों का सावन बरसाया है 

रहता था निर्वासित सा मन जीवन के निर्जन वन में

पावन प्यार भरा गृह इसको तुमने ही लौटाया है

कहते- पीर भरा यह जीवन जो तपते मरुथल सा था

पाकर तेरा स्नेह सलिल अब हरा भरा हो आया है

नीरव हिय का रंगमहल था साज-बाज सब सूने थे

तेरी पायल…

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Added by रामबली गुप्ता on February 11, 2023 at 9:30am — No Comments

कृष्ण नहीं दरकार है भइया

ग़ज़ल

यह कैसा संसार है भइया

दीप तले अँधियार है भइया

जनता के हिस्से की रोटी

खा जाती सरकार है भइया

जाति धरम के बाद यहाँ क्या

जनमत का आधार है भइया

अधर अरुण कलियाँ धनु भौहें

अंजन हाय कटार है भइया

इस जग में कुछ निश्छल भी है

हाँ वह माँ का प्यार है भइया

आज जरूरत है दुर्गा की

कृष्ण नहीं दरकार है भइया

करता चल कुछ काम भले भी

जीना दिन दो चार है…

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Added by रामबली गुप्ता on January 25, 2023 at 8:06am — 6 Comments

ग़ज़ल-सफलता के शिखर पर वे खड़े हैं -रामबली गुप्ता

1222 1222 122

सफलता के शिखर पर वे खड़े हैं

सदा कठिनाइयों से जो लड़े हैं

बताओ नाम तो उन पर्वतों के

हमारे हौसलों से जो बड़े हैं

नहीं हैं नैन ये गर सच कहूँ तो

सुघर चंदा में दो हीरे जड़े हैं

जो प्यासी आत्मा को तृप्त कर दें

नहीं हैं होंठ, वे मधु के घड़े हैं

ये सच है कर्मशीलों के लिए तो

सितारे भूमि पर बिखरे पड़े हैं

ये दिल के घाव अब तक हैं हरे क्यों

यकीनन शूल शब्दों के गड़े…

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Added by रामबली गुप्ता on July 6, 2020 at 11:37pm — 12 Comments

दिन को चैन और रातों को नींद नहीं है इक पल-रामबली गुप्ता

गीत

देखा जब से उनको हिय में हुई अजब सी हलचल।

दिन को चैन और रातों को नींद नहीं है इक पल।।

उनके अरुण अधर ज्यों फूलों की हों कोमल कलियाँ।

जिनसे फूटें स्वर मधुरिम तो गूँजें मन की गलियाँ।।

केशों के झुरमुट में उनका मुखमंडल यों भाये।

घन के मध्य झरोखे में ज्यों इंदु मंद मुसकाये।।

दृग पराग के प्याले हों ज्यों करते हर पल छल-छल।

दिन को चैन और रातों को नींद नहीं है इक पल।।

खिलता यौवन-पुष्प सुरभि यों चहुँ दिश बिखराता…

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Added by रामबली गुप्ता on April 26, 2020 at 11:03pm — 6 Comments

गरीबी न दे ऐ खुदा जिंदगी में-रामबली गुप्ता

महाभुजंगप्रयात सवैया

कड़ी धूप या ठंड हो जानलेवा न थोड़ी दया ये किसी पे दिखाती।
कि लेती कभी सब्र का इम्तिहां और भूखा कभी रात को ये सुलाती।।
जरूरी यहाँ धर्म-कानून से पूर्व दो वक्त की रोटियाँ हैं बताती।
गरीबी न दे ऐ खुदा! जिंदगी में कि इंसान से ये न क्या क्या कराती?

शिल्प-लघु गुरु गुरु(यगण)×8

रचनाकार- रामबली गुप्ता

मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by रामबली गुप्ता on April 23, 2019 at 5:23pm — 5 Comments

वागीश्वरी सवैया-रामबली गुप्ता

सूत्र-सात यगण +गा; 122×7+2

पड़ी जान है मुश्किलों में करूँ क्या कि नैना मिले और ये हो गया।
गई नींद भी औ' लुटा चैन मेरा न जाने जिया ये कहां खो गया।।
जिया के बिना भी जिया जाय कैसे अरे! कौन काँटें यहां बो गया।
हुआ बावरा या नशा प्यार का है संभालो मुझे हाय! मैं तो गया।।

रचनाकार-रामबली गुप्ता

मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by रामबली गुप्ता on April 17, 2019 at 10:29am — 9 Comments

महाभुजंगप्रयात सवैया-रामबली गुप्ता

सूत्र-आठ यगण प्रति पद; 122x8

चुनो मार्ग सच्चा करो कर्म अच्छे जहां में तुम्हारा सदा नाम होगा।

करो यत्न श्रद्धा व निष्ठा भरे तो न पूरा भला कौन सा काम होगा।।

न निर्बाध है लक्ष्य की साधना जूझना मुश्किलों से सरे-आम होगा।

इन्हें जीतना पीढ़ियों के लिए भी तुम्हारा नया एक पैगाम होगा।।1।।

करे सामना धैर्य से मुश्किलों का न कर्तव्य से पैर पीछे हटाए।

नहीं हार से हार माने जहां में कभी कोशिशों से न जो जी चुराए।।

अँधेरा घना या निशा हो घनेरी…

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Added by रामबली गुप्ता on April 13, 2019 at 7:32am — 4 Comments

गीतिका(आधार छंद-दोहा) -रामबली गुप्ता

सोच समझ कर बोलिए, बातें सदा विनीत

छूटा धनु से बाण जो, लौटा कब हे! मीत



तीर-धनुष-तलवार से, बड़े दया औ' प्रेम

इन्हें बना लें शस्त्र यदि, जग को लेंगे जीत।



द्वेष-दंभ सम अरि सखे! यहाँ मनुज के कौन

बिन इनके संहार के, उपजे कब हिय प्रीत



सतत प्रयासों के करें, ऐसे तीव्र प्रहार

पर्वत पथ खुद छोड़ दें, होकर भय से भीत



अधर-सुधा घट भौंह-धनु, मुख…

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Added by रामबली गुप्ता on November 19, 2018 at 1:21pm — 3 Comments

मत्तगयंद सवैया-रामबली गुप्ता

हे! जगदीश! सुनो विनती अब, भक्त तुम्हें दिन-रैन पुकारे।
व्याकुल नैन निहार रहे पथ, पावन दर्शन हेतु तुम्हारे।।
कौन भला जग में अब हे हरि संकट से यह प्राण उबारे।
आ कर दो उजियार प्रभो! हिय, जीवन के हर लो दुख सारे।।

रचनाकार-रामबली गुप्ता

मौलिक एवं अप्रकाशित

सूत्र-भगण×7+गुरु गुरु; 211×7+22

Added by रामबली गुप्ता on October 13, 2018 at 9:48pm — 6 Comments

छप्पय छंद-रामबली गुप्ता

ज्योतिपुंज जगदीश! रहो नित ध्यान हमारे।
कलुष-द्वेष-दुर्भाव, हृदय-तम हर लो सारे।।
सत्य-स्नेह-सद्भाव, समर्पण का प्रभु! वर दो।
जला ज्ञान का दीप, प्रभा-शुचि हिय में भर दो।
दो बल-पौरुष-सद्बुद्धि हरि! मार्ग चुनेें सद्कर्म का।
हर जनजीवन के त्रास हम, फहरायें ध्वज धर्म का।।

मौलिक एवं अप्रकाशित

रचनाकार-रामबली गुप्ता

शिल्प-प्रथम चार पद रोला छंद और अंतिम दो पद उल्लाला छंद के संयोग से छप्पय छंद की निष्पत्ति होती है।

Added by रामबली गुप्ता on October 9, 2018 at 11:30pm — 11 Comments

बन के सूरज सा जमाने में निकलते रहिये-रामबली गुप्ता

ग़ज़ल

2122 1122 1122 22

बन के' सूरज सा' जमाने में' निकलते रहिये

हर अँधेरे को' उजाले मे' बदलते रहिये

जिंदगी एक सफर खुशियों' भरा हो अपना

यूँ ही बस आप मेरे साथ तो चलते रहिये

दिल के' मन्दिर में उजाले की' वज़ह आप ही हैं

अब तो इस दिल में' सदा दीप सा' जलते रहिये

मैं जो' हूँ साथ जमाने से' भला डर कैसा

हो के मायूस न यूँ शाम से ढलते रहिये

मेरे' हर गीत-ग़ज़ल-नज़्म-तरानों में' यूँ ही

बन के' नित…

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Added by रामबली गुप्ता on September 14, 2018 at 1:39pm — 13 Comments

गीत-भावना में प्रेम का रस घोल प्यारे-रामबली गुप्ता

गीत

भावना में प्रेम का रस घोल प्यारे।

प्रेम जीवन में बड़ा अनमोल प्यारे।

भावना में.........

शब्द-शर मुख से निकल कर लौटते कब?

घाव ये गहरे करें हिय में लगें जब।

कर न दें आहत किसी को शब्द तेरे,

मृृदु मधुुुर मकरन्द वाणी बोल प्यारे।

भावना में ........

मत बड़ा छोटा किसी को मान जग में।

काम आ जाए भला कब कौन मग में?

स्नेह का सम्बन्ध ही सबसे उचित है,

तथ्य यह मन की तुला में तोल प्यारे।

भावना…

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Added by रामबली गुप्ता on February 17, 2018 at 9:00pm — 8 Comments

नव प्रेम राग सिरजाय चली-रामबली गुप्ता

लच-लचक-लचक लचकाय चली,
कटि-धनु से शर बरसाय चली।

कजरारे चंचल नयनों से,

हिय पर दामिनि तड़पाय चली।।1।।



फर-फहर फहर फहराय चली,

लट-केश-घटा बिखराय चली।

अलि मनबढ़ सुध-बुध खो बैठे,

अधरों से मधु छलकाय चली।।2।।



सुर-सुरभि-सुरभि सुरभाय चली,

चहुँ ओर दिशा महकाय चली।

चम्पा-जूही सब लज्जित हैं,

तन चंदन-गंध बसाय चली।।3।।



लह-लहर-लहर लहराय चली,

तन से आँचल सरकाय चली।

नव-यौवन-धन तन-कंचन से,

रति मन में अति भड़काय…
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Added by रामबली गुप्ता on February 14, 2018 at 2:28am — 6 Comments

विधाता छंद-रामबली गुप्ता

न किंचित स्वार्थ हो हिय औ', भुला कर वैर जो सारे।

अमीरी औ' गरीबी के, मिटा कर भेद सब प्यारे!

करें सहयोग हर जन का, सभी के काम जो आते।

सदा वे श्रेष्ठ जन जग में, सुयश-सम्मान हैं पाते।।1।।

धरे हिय धैर्य औ' साहस, निरन्तर यत्न जो करते।

न किंचित राह की बाधा, न मुश्किल से किन्हीं डरते।

सहें हर यातना पथ की, शिखर पर किन्तु चढ़ते हैं।

वही प्रतिमान नव बन कर, अमिट इतिहास गढ़ते हैं।।2।।

सदा सुरभित सुमन बन कर, दिलों में जो यहाँ खिलते।

भुला कर…

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Added by रामबली गुप्ता on January 31, 2018 at 11:54am — 7 Comments

कुंडलियाँ-रामबली गुप्ता

जीवन में निज यत्न से, करिये ऐसे काम।

आप रहें या ना रहें, रहे सदा पर नाम।

रहे सदा पर नाम, नया इतिहास बनाएँ।

बनें जगत प्रतिमान, लोग यश गाथा गाएँ।

अगर समर्पण-स्नेह-धैर्य-साहस रख मन में।

हों इस हेतु प्रयास, सफल होंगे जीवन में।।1।।

जग में कठिन न है सखे, करना कोई काम।

दृढ निश्चय कर के बढ़ो, होगा जग में नाम।।

होगा जग में नाम, लक्ष्य पाना जो ठानो।

हर बाधा स्वयमेव, मिटेगी सच यह मानो।।

गिरि-सरि आयें राह , चुभें या काँटें पग में।

लक्ष्य प्राप्त कर…

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Added by रामबली गुप्ता on December 13, 2017 at 1:12pm — 13 Comments

चुनावी दोहे-रामबली गुप्ता

आज चुनावी रंग में, रँगे गली औ' गाँव।

प्रत्याशी हर व्यक्ति के, पकड़ रहे हैं पाँव।।1।।

पोस्टर बैनर से पटे, हैं सब दर-दीवार।

सभी मनाएँ प्रेम से, लोकतंत्र-त्यौहार।।2।।

सोच-समझ कर ही चुनें, जन प्रतिनिधि हे मीत!

सच्चे नेता यदि मिलें, लोकतंत्र की जीत।।3।।

धन-जन-बल-षडयंत्र से, वोट रहे जो मोल।

अरि वे राष्ट्र-समाज के, मत दें हिय में तोल।।4।।

जाति-धर्म के भेद हर आग्रह से हो मुक्त।

चुनें सहज नेतृत्व निज, कर्मठ…

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Added by रामबली गुप्ता on December 11, 2017 at 8:00pm — 10 Comments

पूनम का रजनीश लजाया-रामबली गुप्ता

मत्तगयन्द सवैया



सूत्र=211×7+22; सात भगण+गागा



सुंदर पुष्प सजा तन-कंचन केश-घटा बिखराय चली है।

हैं मद पूरित नैन-सरोवर, ओष्ठ-सुधा छलकाय चली है।।

अंग सुगंध लिए सम चंदन मत्त गयंद लजाय चली है।

लूट लिया हिय चैन सखे! कटि यूँ गगरी रख हाय! चली है।।1।।



यौवन ज्यों मकरन्द भरा घट और सुवासित कंचन काया।

भौंह कमान कटार बने दृग, केश घने सम नीरद-छाया।।

देख छटा मुख की अति सुंदर, पूनम का रजनीश लजाया।

ओष्ठ-खिली कलियाँ अति कोमल, देख हिया-अलि है… Continue

Added by रामबली गुप्ता on November 23, 2017 at 6:30am — 5 Comments

मुख-शशि उज्ज्वल औ' धनु-भौहें

सरसी छंद



शिल्प-16,11 पर यति, चार चरण और दो पद, पदांत में गुरु-लघु।



भाव शब्द-कल गुरु लघु यति का, रखकर समुचित ध्यान।

दोहा तोटक रोला सरसी, रचिये छंद सुजान।।1।।



सोलह ग्यारह पर यति प्रति पद, गुरु-लघु पद के अंत।

चार चरण दो पद का सरसी, गायें सुर-नर-संत।।2।।



मुख-शशि उज्ज्वल औ' धनु-भौहें, तिरछे नैन-कटार।

हाय! डसें लट-अहि केशों के, हिय पर बारम्बार।।3।।



अरुण अधर-कोमल किसलय नव, दृग-मद पूर्ण तड़ाग।

यौवन-पुष्प खिला ज्यों लेकर घट भर… Continue

Added by रामबली गुप्ता on November 13, 2017 at 8:07am — 14 Comments

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