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वागीश्वरी सवैया-रामबली गुप्ता

सूत्र-सात यगण +गा; 122×7+2

पड़ी जान है मुश्किलों में करूँ क्या कि नैना मिले और ये हो गया।
गई नींद भी औ' लुटा चैन मेरा न जाने जिया ये कहां खो गया।।
जिया के बिना भी जिया जाय कैसे अरे! कौन काँटें यहां बो गया।
हुआ बावरा या नशा प्यार का है संभालो मुझे हाय! मैं तो गया।।

रचनाकार-रामबली गुप्ता

मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment by सतविन्द्र कुमार राणा on April 21, 2019 at 12:07pm

बहुत सुंदर छन्द आदरणीय रामबली भाई जी,  विधान यगण ×7 +लगा प्रतीत हो रहाhai. सादर

Comment by रामबली गुप्ता on April 19, 2019 at 5:41pm

आपका बहुत बहुत आभार आदरणीय भाई बृजेश कुमार जी

Comment by रामबली गुप्ता on April 19, 2019 at 5:40pm

सराहना एवं प्रोत्साहन के लिए सादर आभार भाई आद सुशील सरना जी

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on April 19, 2019 at 3:43pm

वाह जी वाह आदरणीय गुप्ता जी खूब छंद निभाया है सुन्दर सरस..

Comment by Sushil Sarna on April 18, 2019 at 8:00pm

आदरणीय रामबली गुप्ता जी अति सुंदर और मनभावन सृजन के लिए दिल से बधाई ।

Comment by रामबली गुप्ता on April 18, 2019 at 3:23pm

लिखने में टंकण त्रुटि हो गई है आदरणीय गोपाल सर जी।क्षमाप्रार्थी हूँ अभी सुधार लेता हूँ। सादर धन्यवाद

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on April 18, 2019 at 1:20pm

प्रिय राम बली जी . आपके सूत्र की मात्रिक व्यवस्था अधूरी है -  (122X 7+ 1 2 )और वर्णिक  व्यवस्था आपने दी  नही (12 वर्ण , 11 वर्ण )

आपके छंद का शिल्प सधा हुआ है i इसके लिए बधाई  I 

Comment by रामबली गुप्ता on April 17, 2019 at 6:34pm

बहुत बहुत धन्यवाद आदरणीय भाई साहब। सब आप सभी सामीप्य और सहयोग से सीखा है।

Comment by Samar kabeer on April 17, 2019 at 6:13pm

जनाब रामबली गुप्ता जी आदाब,बहुत मुश्किल छन्द है भाई,कहने में पसीने आ जाते हैं,मगर आपने बहुत ख़ूब कहा, इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें ।

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