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विधाता छंद-रामबली गुप्ता

न किंचित स्वार्थ हो हिय औ', भुला कर वैर जो सारे।
अमीरी औ' गरीबी के, मिटा कर भेद सब प्यारे!
करें सहयोग हर जन का, सभी के काम जो आते।
सदा वे श्रेष्ठ जन जग में, सुयश-सम्मान हैं पाते।।1।।

धरे हिय धैर्य औ' साहस, निरन्तर यत्न जो करते।
न किंचित राह की बाधा, न मुश्किल से किन्हीं डरते।
सहें हर यातना पथ की, शिखर पर किन्तु चढ़ते हैं।
वही प्रतिमान नव बन कर, अमिट इतिहास गढ़ते हैं।।2।।

सदा सुरभित सुमन बन कर, दिलों में जो यहाँ खिलते।
भुला कर भेद जो सारे, सभी से प्यार से मिलते।।
दिया सौहार्द का बन कर, घना तम द्वेष का हरते।
जगत में पूज्य वे नर जो, मनुजता के लिए मरते।।3।।

मौलिक एवं अप्रकाशित

रचना-रामबली गुप्ता

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Comment by vijay nikore on February 14, 2018 at 9:40am

सुन्दर छन्द लिखे हैं. बधाई। आपकी आँखों की तकलीफ के बारे में सुन कर दुख हुआ... आशा है कि आप शीघ्र अच्छे हो जाएँगे।

Comment by रामबली गुप्ता on February 14, 2018 at 2:22am

हार्दिक आभार आदरणीय लक्ष्मण धामी जी

Comment by रामबली गुप्ता on February 14, 2018 at 2:22am

समर भाई साहब सादर प्रणाम। आजकल कुछ अस्वस्थ हूँ और आँखों में भी तकलीफ है इसलिए समय से प्रतिक्रिया न दे सका। आपकी सराहना एवं प्रतिक्रिया के लिए ह्रदय से आभार।

इस छंद में -1222 1222 , 1222 1222 के वह्र में लिखा जाता है। प्रत्येक पद यही वह्र रहेगा किन्तु 14 मात्रा के बाद यति होनी चाहिए। प्रत्येक छंद में कुल चार पद होते हैं।

Comment by रामबली गुप्ता on February 14, 2018 at 2:13am

आद0 आरिफ़ जी देर से प्रतिक्रिया देने के लिए क्षमाप्रार्थी हूँ। दरअसल आँखों में थोड़ी दिक्कत होने की वजह से मोबाइल देखना नही हो पा रहा। इसलिए समय से प्रतिक्रिया नही दे पाया। अभी भी कुछ दिक्कत है ही। प्रयास पर आपकी प्रशंसा एवं प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक आभार

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on February 2, 2018 at 7:57pm

आ. भाई रामबली जी, सुंदर छंद हुए हैं । हार्दिक बधाई ।

Comment by Samar kabeer on February 1, 2018 at 5:56pm

जनाब रामबली गुप्ता जी आदाब,बहुत उम्दा छन्द लिखे आपने,इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें ।

छन्द विधान लिख देते तो कुछ कहने में आसानी होती ।

Comment by Mohammed Arif on February 1, 2018 at 7:59am

आदरणीय रामबली गुप्ता जी आदाब,

                              सबके कल्याण और अच्छी मनोकामना से युक्त बेहतरीन विधाता छंद । हार्दिक बधाई स्वीकार करें । काश! छांदसिक विधान भी लिख दिया होता ।

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