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नव प्रेम राग सिरजाय चली-रामबली गुप्ता

लच-लचक-लचक लचकाय चली,
कटि-धनु से शर बरसाय चली।
कजरारे चंचल नयनों से,
हिय पर दामिनि तड़पाय चली।।1।।

फर-फहर फहर फहराय चली,
लट-केश-घटा बिखराय चली।
अलि मनबढ़ सुध-बुध खो बैठे,
अधरों से मधु छलकाय चली।।2।।

सुर-सुरभि-सुरभि सुरभाय चली,
चहुँ ओर दिशा महकाय चली।
चम्पा-जूही सब लज्जित हैं,
तन चंदन-गंध बसाय चली।।3।।

लह-लहर-लहर लहराय चली,
तन से आँचल सरकाय चली।
नव-यौवन-धन तन-कंचन से,
रति मन में अति भड़काय चली।।4।।

झन-झनन-झनन झनकाय चली,
पायल-चूड़ी खनकाय चली।
हिय के हर तार झंझोर सखे!
नव-प्रेम-राग सिरजाय चली।।5।।
मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment by रामबली गुप्ता on February 18, 2018 at 9:40pm

सादर आभार आदरणीय बृजेश कुमार जी

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on February 18, 2018 at 7:07pm

वाह आदरणीय क्या शानदार रचना है..

Comment by रामबली गुप्ता on February 17, 2018 at 9:23pm

धन्यवाद भाई सुरेन्द्र नाथ जी

Comment by नाथ सोनांचली on February 16, 2018 at 10:05pm

आद0 रामबली जी सादर अभिवादन। बहुत बेहतरीन गीत। पढ़कर मजा आ गया। बधाई इसस प्रस्तुति पर

Comment by रामबली गुप्ता on February 15, 2018 at 3:47pm

आदरणीय आरिफ़ जी प्रयास पर प्रोत्साहन और सराहना के लिए ह्रदय से धन्यवाद। वैसे किसी विशेष छंद का आधार तो नही लिया गया है। आप चाहें तो प्रत्येक लाइन को 16 मात्राओं में रख सकते हैं।सादर

Comment by Mohammed Arif on February 15, 2018 at 8:02am

आदरणीय राम बली गुप्ता जी आदाब,

                              रचना पढ़कर मज़ा आ गया । बहुत बेहतरीन ध्वन्यत्मकता । रीतिकाल की रचनाओं की याद आ गई । आपने इसका छांदसिक विधान नहीं लिखा ? 

                              हार्दिक बधाई स्वीकार करें ।

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