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गीतिका(आधार छंद-दोहा) -रामबली गुप्ता

सोच समझ कर बोलिए, बातें सदा विनीत
छूटा धनु से बाण जो, लौटा कब हे! मीत

तीर-धनुष-तलवार से, बड़े दया औ' प्रेम
इन्हें बना लें शस्त्र यदि, जग को लेंगे जीत।

द्वेष-दंभ सम अरि सखे! यहाँ मनुज के कौन
बिन इनके संहार के, उपजे कब हिय प्रीत

सतत प्रयासों के करें, ऐसे तीव्र प्रहार
पर्वत पथ खुद छोड़ दें, होकर भय से भीत

अधर-सुधा घट भौंह-धनु, मुख उज्ज्वल सम चंद्र
दृग-मद सर मृदु बोल ज्यों, रति ने गाया गीत

उसके आने से सदा, हो चेतन तन प्राण
मन के सूने साज तब, छेड़ें मृदु संगीत

श्री के सम्मुख शारदे! घटा तुम्हारा मान
हाय! भरत की भूमि पर, आई कैसी रीत

धरे सुखद छवि हिय करें, कल का स्वागत भ्रात
करके जीवन का दुखद, विस्मृत विगत अतीत

जग-जन-हित शुचि कर्म का, हो यदि मन में भाव
वृक्षारोपण सा कहाँ, है तब कार्य पुनीत

रचनाकार- रामबली गुप्ता

मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment by rajesh kumari on November 21, 2018 at 11:17am

बहुत बढ़िया(आधार छंद ) छंद गीतिका लिखी है आद० रामबली जी बहुत बहुत बधाई लीजिये 

अधर-सुधा घट भौंह-धनु, मुख उज्ज्वल सम चंद्र
दृग-मद सर मृदु बोल ज्यों, रति ने गाया गीत----वाह्ह्हह्ह लजवाब 

Comment by Sushil Sarna on November 19, 2018 at 3:49pm

सोच समझ कर बोलिए, बातें सदा विनीत
छूटा धनु से बाण जो, लौटा कब हे! मीत

बहुत सुंदर आदरणीय रामबली गुप्ता जी ... इस भावपूर्ण गीतिका के लिए हार्दिक बधाई।

Comment by Samar kabeer on November 19, 2018 at 2:50pm

जनाब रामबली गुप्ता जी आदाब,अच्छी रचना हुई है,इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें ।

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