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मत्तगयंद सवैया-रामबली गुप्ता

हे! जगदीश! सुनो विनती अब, भक्त तुम्हें दिन-रैन पुकारे।
व्याकुल नैन निहार रहे पथ, पावन दर्शन हेतु तुम्हारे।।
कौन भला जग में अब हे हरि संकट से यह प्राण उबारे।
आ कर दो उजियार प्रभो! हिय, जीवन के हर लो दुख सारे।।

रचनाकार-रामबली गुप्ता

मौलिक एवं अप्रकाशित

सूत्र-भगण×7+गुरु गुरु; 211×7+22

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Comment by नाथ सोनांचली on October 16, 2018 at 4:17pm

आद0 रामबली जी सादर अभिवादन। बढ़िया भक्ति भाव से भरी छंद रचना की आपने। बधाई स्वीकार कीजिये

Comment by डॉ छोटेलाल सिंह on October 16, 2018 at 3:11pm

आदरणीय रामबली जी आप तो इस विधा के माहिर हैं आपकी काबिलियत को नमन

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on October 16, 2018 at 1:42pm

आ. भाई रामबली जी, सुंदर छंद हुये हैं । हार्दिक बधाई ।

Comment by Samar kabeer on October 15, 2018 at 2:55pm

जनाब रामबली गुप्ता जी आदाब,अच्छी छन्द रचना हुई है,बधाई स्वीकार करें ।

Comment by Samar kabeer on October 15, 2018 at 2:52pm

जनाब बृजेश जी,इतनी छोटी टिप्पणी देना ओबीओ की परिपाटी नहीं है,कृपया इस ओर ध्यान दें ।

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on October 14, 2018 at 7:20pm

बहुत ही उत्तम रचना आदरणीय...

कृपया ध्यान दे...

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